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कैंसर किलर बायो चिप का सफल परीक्षण

कैंसर के ईलाज में स्विस वैज्ञानिकों ने भी नई खबर दी

  • परीक्षण में 95 फीसद सफलता

  • यह खराब खून को साफ करता है

  • अब पहनने योग्य बनाने पर काम जारी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः कैंसर आज के युग की सबसे घातक बीमारियों में से एक है, जिसका उपचार अक्सर शरीर के लिए अत्यंत कष्टकारी होता है। लेकिन हाल ही में स्विस वैज्ञानिकों (ईपीएफएल और ज्यूरिख विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं) ने एक ऐसी बायो-चिप विकसित की है, जो भविष्य में कैंसर के इलाज की दिशा पूरी तरह बदल सकती है। इस तकनीक को लिक्विड बायोप्सी और नैनो-फिल्ट्रेशन का एक उन्नत रूप माना जा रहा है।

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जब किसी व्यक्ति को कैंसर होता है, तो ट्यूमर से कुछ सूक्ष्म कोशिकाएं टूटकर रक्त के प्रवाह में मिल जाती हैं, जिन्हें सर्कुलेटिंग ट्यूमर सेल्स कहा जाता है। यही कोशिकाएं कैंसर को शरीर के एक अंग से दूसरे अंग तक फैलाने (मेटास्टेसिस) के लिए जिम्मेदार होती हैं। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह नई चिप सीधे रक्त संचार प्रणाली से जुड़ी होती है। इसमें नैनो-स्केल के ऐसे सेंसर्स और फिल्टर्स लगे हैं जो स्वस्थ रक्त कोशिकाओं और कैंसर कोशिकाओं के बीच के सूक्ष्म अंतर को पहचान लेते हैं।

इस चिप की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सिलेक्टिविटी है। यह चिप केवल उन विशिष्ट प्रोटीन्स और आनुवंशिक संकेतों को पहचानती है जो केवल कैंसर कोशिकाओं की सतह पर पाए जाते हैं। जैसे ही कोई कैंसर कोशिका इस चिप के संपर्क में आती है, चिप उसे एक हल्के विद्युत प्रवाह या लक्षित एंजाइम के माध्यम से वहीं नष्ट कर देती है।

वर्तमान में कैंसर के लिए कीमोथेरेपी का उपयोग किया जाता है, जो कैंसर कोशिकाओं के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाओं को भी नष्ट कर देती है, जिससे बाल झड़ना, कमजोरी और इम्यून सिस्टम खराब होने जैसे गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं। इसके विपरीत, यह बायो-चिप पूरी तरह से नॉन-इनवेसिव (गैर-आक्रामक) है। यह स्वस्थ कोशिकाओं को छुए बिना केवल घातक कोशिकाओं को लक्षित करती है। प्रारंभिक क्लिनिकल ट्रायल में इस चिप ने 95 फीसद से अधिक सफलता दर दर्ज की है।

वैज्ञानिकों का लक्ष्य अब इस चिप को पहनने योग्य डिवाइस या छोटे इम्प्लांट के रूप में विकसित करना है। यदि ऐसा होता है, तो कैंसर के मरीज को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होगी; यह डिवाइस चौबीसों घंटे उनके रक्त को साफ़ करता रहेगा और कैंसर को दोबारा पनपने से रोकेगा। यह खोज न केवल इलाज को सस्ता बनाएगी, बल्कि मरीजों के जीवन की गुणवत्ता में भी भारी सुधार करेगी।

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