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बिना चुनाव जीते यह मंत्री क्यों बना हुआ हैः सुप्रीम कोर्ट

दीपक प्रकाश के मुद्दे पर फंस गयी है सम्राट चौधरी की सरकार

नीतीश के बाद सम्राट की सरकार

राज्य से स्पष्टीकरण मांगा गया

संविधान में इसकी अनुमति नहीं

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बिहार सरकार से एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल पूछा है: क्या एक गैर-निर्वाचित व्यक्ति बार-बार मंत्री पद की शपथ लेकर छह महीने की संवैधानिक समय सीमा को दरकिनार कर सकता है? भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राज्य सरकार को स्पष्टीकरण देने को कहा है कि दीपक प्रकाश बिना विधायक या विधान पार्षद बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री कैसे रह सकते हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को तय की गई है।

मामला बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश से जुड़ा है। वे नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में चार महीने 26 दिन तक मंत्री रहे। अप्रैल 2026 में सरकार गिरने के बाद वे 22 दिनों तक सत्ता से बाहर रहे। 7 मई को सम्राट चौधरी द्वारा नई सरकार बनाने के बाद, उन्हें फिर से मंत्री बनाया गया। अब कुल मिलाकर उनका कार्यकाल छह महीने से अधिक हो गया है, जबकि वे अभी भी निर्वाचित सदस्य नहीं हैं।

संवैधानिक प्रावधान, विशेष रूप से अनुच्छेद 164(4), यह कहता है कि यदि कोई मंत्री राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर निर्वाचित होना अनिवार्य है, अन्यथा उसे पद छोड़ना पड़ेगा। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह प्रक्रिया संविधान के साथ धोखाधड़ी है, क्योंकि दीपक प्रकाश ने इस छह महीने की छूट का लाभ दो अलग-अलग कार्यकालों में उठाया है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अतीत में कई नेताओं जैसे उद्धव ठाकरे या एच.डी. देवेगौड़ा ने बिना निर्वाचित हुए पद संभाला और फिर विधान परिषद या राज्यसभा के माध्यम से अपनी सदस्यता सुनिश्चित की। हालांकि, दीपक प्रकाश का मामला अनोखा है क्योंकि उन्होंने बीच में पद छोड़कर फिर से शपथ ली है। अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि क्या छह महीने की ग्रेस पीरियड को बार-बार रीसेट किया जा सकता है।

यह फैसला भारत में संवैधानिक व्याख्याओं के लिए एक मिसाल बनेगा। कोर्ट यह देखेगा कि क्या कोई मंत्री छह महीने की समय सीमा पूरी होने से ठीक पहले इस्तीफा देकर और फिर से नियुक्त होकर कानून की मूल भावना को विफल कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई न केवल दीपक प्रकाश के राजनीतिक भविष्य को तय करेगी, बल्कि भविष्य में होने वाली ऐसी नियुक्तियों के लिए भी एक स्पष्ट कानूनी दायरा तय करेगी।