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ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण पर गंभीर नजरिया

पर्यावरण संरक्षण अब कंपनियों का संवैधानिक कर्तव्य: सुप्रीम कोर्ट

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने एक युगांतकारी निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि वन्यजीवों और प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना अब कॉर्पोरेट घरानों के लिए केवल एक ऐच्छिक नैतिक कार्य नहीं, बल्कि एक अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है। न्यायमूर्ति पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने जोर देकर कहा कि कंपनियों को अब केवल अपने शेयरधारकों के मुनाफे के प्रति ही नहीं, बल्कि उस पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति भी जवाबदेह होना होगा जिसमें वे फल-फूल रही हैं।

यह ऐतिहासिक फैसला राजस्थान और गुजरात के उन क्षेत्रों में सक्रिय खनन और बिजली उत्पादन कंपनियों की याचिकाओं को खारिज करते हुए आया, जिन्हें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) के संरक्षण के लिए संवेदनशील घोषित किया गया है। ये कंपनियां शीर्ष अदालत द्वारा 2021 और 2024 में दिए गए उन आदेशों में ढील चाहती थीं, जो इस लुप्तप्राय पक्षी के आवासों में औद्योगिक गतिविधियों को प्रतिबंधित करते हैं। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि कोई भी व्यापारिक विस्तार किसी प्रजाति के विलुप्त होने की कीमत पर नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची सात का उल्लेख किया, जो कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत स्वीकार्य गतिविधियों को सूचीबद्ध करती है। इसमें स्पष्ट रूप से पर्यावरणीय स्थिरता, पारिस्थितिक संतुलन और वनस्पतियों एवं जीवों की सुरक्षा को शामिल किया गया है। अदालत ने टिप्पणी की, कानून इन गतिविधियों को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में वर्गीकृत कर यह स्वीकार करता है कि मनुष्य के रूप में हम पर्यावरण के मालिक नहीं हैं और न ही इसे केवल अपने उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। कंपनियों की परिभाषा में सामाजिक जिम्मेदारी के भीतर पर्यावरणीय जिम्मेदारी स्वाभाविक रूप से अंतर्निहित होनी चाहिए। कोई भी कंपनी खुद को सामाजिक रूप से जिम्मेदार नहीं कह सकती यदि वह अपने आसपास के जीवों और पर्यावरण की अनदेखी करती है।

पीठ ने प्रदूषक भुगतान सिद्धांत की व्याख्या करते हुए कहा कि यदि खनन या बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से किसी संकटग्रस्त प्रजाति के आवास को खतरा पहुंचता है, तो उसके पुनरुद्धार और संरक्षण का पूरा खर्च संबंधित कंपनी को ही उठाना होगा। इसके लिए कंपनियों को अपने सीएसआर फंड का एक बड़ा हिस्सा इन-सिटु (प्राकृतिक आवास) और एक्स-सिटु (आवास से बाहर) संरक्षण प्रयासों में लगाना चाहिए।

अदालत ने एक बहुत ही मार्मिक और गहरी बात कही कि सौर या गैर-नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक इन क्षेत्रों में केवल अतिथि की तरह हैं। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि यह आवास मूल रूप से ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का है और उनकी गतिविधियां इस तरह होनी चाहिए कि वे उस पक्षी के घर में बाधा न डालें।

अंत में, कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 51 ए(जी) की याद दिलाई, जो हर नागरिक और संस्था पर यह मौलिक कर्तव्य थोपता है कि वे वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करें और जीवित प्राणियों के प्रति करुणा रखें। यह फैसला भविष्य में कॉर्पोरेट जगत के लिए पर्यावरण प्रबंधन के नए मानक स्थापित करेगा।