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सरकार का सरपंच पति के खिलाफ अभियान

ग्रामीण शासन के असली अवरोध को भी हटाने की पहल

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: भारत सरकार ने रविवार को सरपंच पति की परंपरा को चुनौती देने के लिए एक विशेष सोशल मीडिया अभियान की शुरुआत की है। पंचायती राज मंत्रालय ने से नो टू प्रॉक्सी सरपंच नामक इस अभियान की घोषणा करते हुए कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य महिला सरपंचों को वास्तविक शक्ति प्रदान करना है।

मंत्रालय ने नागरिकों से इस आंदोलन में शामिल होने, वास्तविक महिला नेतृत्व का सम्मान करने और गांवों में प्रचलित सरपंच पति संस्कृति पर अपने विचार साझा करने का आह्वान किया है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर शुरू किया गया यह अभियान 18 मार्च तक चलेगा।

पंचायती राज मंत्रालय ने इसे सभी राज्य पंचायती राज विभागों और पंचायत स्तर के पदाधिकारियों के सहयोग से लॉन्च किया है। मंत्रालय के अनुसार, इस सोशल मीडिया अभियान का उद्देश्य उस छद्म प्रतिनिधित्व के खिलाफ देशव्यापी जागरूकता पैदा करना है, जहाँ निर्वाचित महिला सरपंचों को दरकिनार कर दिया जाता है और उनके पुरुष रिश्तेदार, जिन्हें आमतौर पर सरपंच पति या प्रधान पति कहा जाता है, उनके नाम पर सत्ता का प्रयोग करते हैं।

इस अभियान के माध्यम से सरकार न केवल छद्म शासन की आलोचना करना चाहती है, बल्कि समुदायों को महिला प्रतिनिधियों के लोकतांत्रिक अधिकार का सम्मान करने के लिए प्रोत्साहित भी करना चाहती है। मंत्रालय का लक्ष्य गांवों से उठने वाली आवाजों को बुलंद करना और जमीनी स्तर के वास्तविक नेतृत्व का उत्सव मनाना है। यह प्रयास एक ऐसी राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ना चाहता है जो स्थानीय शासन में महिला नेताओं के लिए जनादेश का सम्मान करने की दिशा में एक व्यवहारिक बदलाव ला सके।

कड़े दंड और निगरानी तंत्र का सुझाव उल्लेखनीय है कि पिछले साल पंचायती राज मंत्रालय द्वारा गठित एक सलाहकार समिति ने अपनी रिपोर्ट में सरपंच पति, मुखिया पति और प्रधान पति जैसी प्रथाओं पर अंकुश लगाने के लिए अनुकरणीय दंड लागू करने का सुझाव दिया था। समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि छद्म नेतृत्व की गोपनीय शिकायतों के लिए हेल्पलाइन और महिला वॉचडॉग कमेटी के माध्यम से एक मजबूत रिपोर्टिंग तंत्र बनाया जाए। सत्यापित मामलों में शिकायतकर्ता को पुरस्कृत किया जाए। क्षमता निर्माण और मेंटरशिप के माध्यम से जमीनी स्तर से लेकर शीर्ष तक एक निगरानी ढांचा स्थापित किया जाए।

यह सलाहकार समिति सितंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट के जुलाई के आदेश के बाद गठित की गई थी। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए 14 राज्यों के साथ गहन परामर्श और क्षेत्रीय कार्यशालाएं आयोजित की गई थीं। सरकार का यह कदम पंचायतों में महिलाओं की 33 फीसद से 50 फीसद भागीदारी को केवल कागजों तक सीमित न रखकर उसे वास्तविक धरातल पर उतारने की एक बड़ी कोशिश है।