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छत्तीसगढ़ विधानसभा में मुख्य विपक्ष का हंगामा

केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग पर कांग्रेस का आक्रामक रुख

राष्ट्रीय खबर

रायपुर: छत्तीसगढ़ विधानसभा के शीतकालीन सत्र का चौथा दिन राजनीतिक गहमागहमी और हंगामे की भेंट चढ़ गया। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार द्वारा प्रवर्तन निदेशालय और अन्य केंद्रीय जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग को लेकर मोर्चा खोल दिया।

कांग्रेस विधायकों ने इस संवेदनशील विषय पर तत्काल चर्चा के लिए स्थगन प्रस्ताव पेश किया, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह द्वारा इसे खारिज किए जाने के बाद सदन में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई। अध्यक्ष के फैसले से असंतुष्ट कांग्रेस विधायक नारेबाजी करते हुए सदन के गर्भगृह (वेल) में उतर आए, जिससे कार्यवाही कई बार बाधित हुई।

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित विपक्ष को डराने और दबाने के लिए कर रहा है। बघेल ने जांच प्रक्रियाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा, लोकतंत्र की हत्या की जा रही है। गवाहों के बयान जो कानूनन कैमरे की निगरानी में अदालत में दर्ज होने चाहिए, उन्हें डरा-धमकाकर ईडी के कार्यालयों में दर्ज किया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि सदन के सभी कार्य रोककर इस विषय पर विस्तृत चर्चा कराई जाए।

विपक्ष का विरोध केवल जुबानी नहीं था; कांग्रेस विधायक हाथों में सत्यमेव जयते लिखी हुई तख्तियां लेकर सदन में पहुंचे थे। वे नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ हो रही जांच को राजनीति से प्रेरित बताते हुए विरोध कर रहे थे। सदन के भीतर भारत माता की जय और जांच एजेंसियों का दुरुपयोग बंद करो जैसे नारों से माहौल तनावपूर्ण हो गया। इस दौरान सत्ता पक्ष के वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर और विपक्षी सदस्यों के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई।

सदन में लगातार हो रहे व्यवधान और नारेबाजी को अनुशासनहीनता मानते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने कड़ा रुख अपनाया और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित कांग्रेस के सभी 34 विधायकों को निलंबित करने की घोषणा कर दी। हालांकि, विधायी प्रक्रियाओं और चर्चा के बाद इस निलंबन को बाद में वापस ले लिया गया, लेकिन कांग्रेस के सदस्यों ने अपना विरोध जारी रखा। निलंबन रद्द होने के बावजूद कांग्रेस विधायक दोबारा सदन की कार्यवाही में शामिल नहीं हुए और विरोध स्वरूप बाहर ही रहे। इसके परिणामस्वरूप, दिन की शेष विधायी कार्यवाही विपक्ष की अनुपस्थिति में ही पूरी की गई।