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लगातार बातचीत में अब नाटो वाली शर्त पर नर्म पड़े जेलेंस्की

यूक्रेन-रूस शांति वार्ता पर नया मोड़

बर्लिनः यूक्रेन और रूस के बीच जारी विनाशकारी युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव देखने को मिला है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने हाल के बयानों और राजनयिक चैनलों के माध्यम से संकेत दिया है कि वह रूस के साथ औपचारिक शांति समझौते के लिए बातचीत की मेज पर आने को तैयार हो सकते हैं। यह रुख युद्ध की शुरुआत से उनके कठोर सार्वजनिक रुख से काफी अलग है, जिसे पश्चिमी सहयोगियों और घरेलू दबाव दोनों के परिणाम के रूप में देखा जा रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, ज़ेलेंस्की ने अपनी उस प्रमुख शर्त को नरम कर दिया है, जो लंबे समय से किसी भी सार्थक बातचीत के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई थी नाटो की पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने की तत्काल और अनिवार्य मांग। ऐसा प्रतीत होता है कि कीव अब नाटो में पूर्ण प्रवेश की मांग के बजाय सुरक्षा गारंटियों के किसी वैकल्पिक मॉडल को स्वीकार करने के लिए तैयार है।

ये गारंटियाँ, संभवतः प्रमुख पश्चिमी शक्तियों द्वारा प्रदान की जाएंगी, जिसमें भविष्य में रूस द्वारा किए जाने वाले किसी भी हमले की स्थिति में सैन्य सहायता और हथियार आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। इस लचीलेपन को मास्को की एक प्रमुख आपत्ति को दूर करने और गतिरोध को तोड़ने के लिए एक रणनीतिक रियायत माना जा रहा है।

हालांकि, इस कूटनीतिक लचीलेपन के साथ ही ज़ेलेंस्की ने एक अटल सीमा भी खींच दी है: यूक्रेन किसी भी हाल में रूस को अपनी एक इंच भी जमीन नहीं सौंपेगा। इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। इसका सीधा अर्थ है कि रूस द्वारा कब्ज़ा किए गए क्रीमिया और डोनबास के क्षेत्रों की स्थिति शांति समझौते के बावजूद एक जटिल मुद्दा बनी रहेगी। ज़ेलेंस्की का यह रुख देश की संप्रभुता और जनता की भावनाओं को दर्शाता है, जो युद्ध की भारी कीमत चुकाने के बावजूद क्षेत्रों को छोड़ने के खिलाफ हैं।

यह नया, अधिक लचीला रुख कूटनीतिक हल निकालने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है। पश्चिमी विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन, जो सैन्य और आर्थिक दोनों तरह के निरंतर अंतर्राष्ट्रीय समर्थन पर निर्भर है, अब युद्ध की थकावट और अपने सहयोगियों पर बढ़ते दबाव को समझते हुए एक यथार्थवादी समाधान की तलाश कर रहा है।

यदि यह नरम रुख बातचीत को फिर से शुरू करने में सफल होता है, तो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को एक ऐसी शांति संधि की उम्मीद होगी जो एक ओर यूक्रेन की संप्रभुता की रक्षा करे और दूसरी ओर रूस के सुरक्षा हितों को भी आंशिक रूप से संबोधित करे। बहरहाल, जमीन पर सैन्य स्थिति और वार्ता की जटिलताएं दर्शाती हैं कि अंतिम शांति समझौता अभी भी एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है।