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सैयारा तू तो बदला नहीं है मौसम जरा सा .. .. .. ..

पुरानी कहावत है कि जब टैम खराब होता है तो ऊंट पर बैठे व्यक्ति को भी कुत्ता काट लेता है। फिलहाल भारतीय राजनीति में कुछ ऐसा ही माहौल बना हुआ है। भारतीय राजनीति का मौजूदा शो एक ज़बरदस्त ड्रामा है, जिसे लोकतंत्र का सर्कस कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक तरफ़ दिल्ली की सर्दियाँ हैं, तो दूसरी तरफ़ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की गरमाहट।

इस बीच, हमारे माननीय सांसदों ने संसद के शीतकालीन सत्र को सफलतापूर्वक एक ऐसी जगह में बदल दिया है जहाँ कानून कम बनते हैं, और माइक पर आवाज़ उठाना ज़्यादा ज़रूरी होता है, भले ही वह आवाज़ सिर्फ़ स्थगन की माँग कर रही हो।

यह वो समय होता है जब सभी दल राष्ट्र निर्माण की पवित्र शपथ लेकर आते हैं—और फिर उसे लॉबी में भूल जाते हैं। हाल ही में, राज्यसभा में एक भी फुल-टाइम मंत्री मौजूद नहीं था। उपराष्ट्रपति महोदय को 10 मिनट के लिए सत्र स्थगित करना पड़ा।

विपक्ष ने इसे सदन का अपमान कहा। अब ज़रा सोचिए, एक भी फुल-टाइम मंत्री का न होना अपमान है, लेकिन संसद को लगातार हंगामे के नाम पर स्थगित करना शायद लोकतांत्रिक परंपरा है। शायद मंत्रीगण इस ठंड में अपने फुल-टाइम ज़िम्मेदारियों से थोड़ा ब्रेक लेकर, पार्ट-टाइम विश्राम पर थे। आख़िर देश चलाना कोई बच्चों का खेल नहीं है, उसके लिए फुल-टाइम एनर्जी चाहिए।

लेकिन असली जादू तो संसद के बाहर हो रहा है, जहाँ चुनाव आयोग के ड्राफ्ट ने क़रीब 58 लाख मतदाताओं को बाहर का रास्ता दिखाया है। और इस सूची में जो खुलासे हुए हैं, वे किसी साइंस फिक्शन फ़िल्म से कम नहीं हैं। पता चला है कि 12 लाख मतदाता ऐसे हैं जो 15 साल से कम उम्र में पिता बन गए!

वाह! क्या अद्भुत देश है हमारा, जहाँ नागरिक इतनी तेज़ी से ग्रो करते हैं कि प्राकृतिक नियमों को भी धता बता देते हैं। अब यह वोट चोरी है या हमारे नागरिकों की समय से आगे वाली अद्भुत क्षमता, यह तो ए आई टेक्नोलॉजी ही जानेगी, जिसका इस्तेमाल इस सत्यापन प्रक्रिया में हुआ है।

इसी बात पर एक नई फिल्मी गीत की चर्चा प्रासंगिक है। यह इस साल का सबसे बड़ा सुपरहिट गीत है। फिल्म सैयारा के इस गीत को लिखा था इरशाद कामिल ने और संगीत में ढाला है तनिष्क बागची, फहीम अब्दुल्ला और अर्सलान निजामी ने। इस गीत को फहीम अब्दुल्ला ने अपना स्वर दिया है। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

रात गुज़र जाती है ऐसे तुम मेरे हो, मैं तुम्हारा हूँ जैसे ख़्वाबों से हो के,

हाथों से छू के आसमाँ उतर आता है ऐसे

सैयारा, तू तो बदला नहीं है मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है फिर क्यों,

फिर क्यों, फिर क्यों दूरियाँ हैं दरमियाँ, हाँ

तेरी आँखों में जो नूर है, मेरा हर पल उसी से मशहूर है

इश्क़ की बातें, तेरी और मेरी रातें बस यही तो दिल का क़ुसूर है

ओ… ये दिल्लगी है, ये दीवानगी है हर साँस में बस तू ही बसी है

तेरी हर अदा से, है रूह को ये पता ज़िंदगी तेरी मुझमें फँसी है

सैयारा, तू तो बदला नहीं है मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है फिर क्यों,

फिर क्यों, फिर क्यों दूरियाँ हैं दरमियाँ, हाँ

लम्हे ये प्यारे, ये सारे नज़ारे पहले कभी भी देखे नहीं थे ये राहें हसीं हैं,

ये मौसम ज़मीं है पहले कभी भी इतने सही नहीं थे

ओ… ये शामें जवाँ हैं, ये दिन मेहरबाँ हैं तेरी चाहतों का हर रंग चढ़ा है

तुम मिले जो मुझको, तो पाया है सब को बस तू ही मेरी दुनिया है, ख़ुदा है

सैयारा, तू तो बदला नहीं है मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है

फिर क्यों, फिर क्यों, फिर क्यों दूरियाँ हैं दरमियाँ, हाँ

सत्ता पक्ष इसे स्वच्छ भारत अभियान का चुनावी संस्करण बता रहा है—फर्जी नामों और रोहिंग्याओं के कूड़े को साफ़ करना। विपक्ष चीख़ रहा है कि यह लोकतंत्र की हत्या है, और ए आई ने ग़लती से उनके वफ़ादार वोट काट दिए हैं। दरअसल, यह 58 लाख का आँकड़ा भारतीय राजनीति के लिए एक नया ब्लैंक चेक है—जिसका उपयोग हर दल अपनी सुविधा के अनुसार कर सकता है।

कौन असली वोटर है और कौन अल्ट्रा-फास्ट डैडी, यह पता लगाना शायद भारत के सबसे बड़े जासूसी रहस्यों में से एक रहेगा। एक बात साफ़ है: भारतीय लोकतंत्र हमेशा मनोरंजन का फुल-टाइम पैकेज देता रहेगा। हमें बस यह तय करना है कि हम इसे नाटक मानकर तालियाँ बजाएँ, या इसे कॉमेडी समझकर हँसें। और हाँ, अगर आप 16 दिसंबर के बाद अपनी मतदाता सूची में अपना नाम न पाएँ, तो चिंता न करें—हो सकता है ए आई ने आपको किसी 15 वर्षीय फास्ट डैडी का दादा समझ लिया हो!