इसरो के वैज्ञानिकों के अथक प्रयास का परिणाम सामने आया
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गगनयान मिशन का काम चल रहा है
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निचली कक्षा में इसे स्थापित किया जाएगा
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इसका वजन बीस टन होने की चर्चा है
राष्ट्रीय खबर
रांचीः भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने महत्वाकांक्षी भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के डिजाइन को अंतिम रूप दे दिया है, जो देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम है। यह परियोजना भारत को उन चुनिंदा वैश्विक शक्तियों की सूची में शामिल कर देगी जिनके पास अंतरिक्ष में अपनी स्थायी चौकी है, जिससे वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी विकास के नए द्वार खुलेंगे।
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यह अंतरिक्ष स्टेशन मुख्य रूप से एक मॉड्यूलर संरचना के रूप में तैयार किया जाएगा, जिसका अर्थ है कि इसके विभिन्न हिस्सों (मॉड्यूल्स) को पृथ्वी पर निर्मित करके, अलग-अलग रॉकेट मिशनों के माध्यम से अंतरिक्ष में ले जाया जाएगा और अंततः कक्षा में जोड़ा जाएगा। इस स्टेशन को पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर की निचली पृथ्वी कक्षा में स्थापित करने की योजना है, जहाँ वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन भी परिचालित है।
प्रारंभिक चरण में, अंतरिक्ष स्टेशन का वजन लगभग 20 टन होने की उम्मीद है, जिसमें 3 से 4 अंतरिक्ष यात्रियों को एक समय में रहने और वैज्ञानिक प्रयोग करने की क्षमता होगी। इसका प्राथमिक उद्देश्य माइक्रोग्रैविटी वातावरण में जीव विज्ञान, भौतिकी, सामग्री विज्ञान और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में गहन वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना होगा। यह स्टेशन भविष्य के दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष अभियानों के लिए प्रशिक्षण और तकनीक सत्यापन का केंद्र भी बनेगा।
इसरो का लक्ष्य है कि गगनयान मिशन के सफल समापन के बाद, 2035 तक इस अंतरिक्ष स्टेशन को पूरी तरह से कार्यरत कर दिया जाए। इसके निर्माण और संचालन में मुख्य रूप से लॉन्च वाहन मार्क-3 (एलवीएम 3) रॉकेट का उपयोग किया जाएगा, जिसे हेवी लिफ्ट क्षमता के लिए अपग्रेड किया जाएगा। इसरो को इस परियोजना के लिए डॉकिंग और बर्थिंग (अंतरिक्ष में दो अंतरिक्ष यानों या घटकों को जोड़ने की तकनीक) जैसी महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में महारत हासिल करनी होगी।
हालांकि, इसरो ने अभी तक इस विशाल परियोजना की कुल और अंतिम लागत का आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है, लेकिन अंतरिक्ष विशेषज्ञों के अनुसार इसकी अनुमानित लागत 20,000 करोड़ रुपये से 30,000 करोड़ रुपये के बीच हो सकती है। यह राशि चरणबद्ध तरीके से अगले डेढ़ दशक में निवेश की जाएगी। यह खर्च न केवल निर्माण पर होगा, बल्कि इसमें अंतरिक्ष यात्रियों का प्रशिक्षण, लगातार कार्गो मिशन (भोजन, पानी, उपकरण पहुँचाना), और स्टेशन के संचालन तथा रखरखाव की लागत भी शामिल होगी।
यह अंतरिक्ष स्टेशन भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा और तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनेगा, जो देश को अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में एक अग्रणी शक्ति के रूप में स्थापित करेगा। यह आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पहल के तहत भारतीय उद्योग के लिए भी नए अवसर पैदा करेगा।
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