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विश्व एड्स दिवस: लोहरदगा में एचआईवी संक्रमित मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी, जागरूक होने की जरूरत

लोहरदगा: एड्स एक ऐसी बीमारी है, जिससे सिर्फ एक मरीज प्रभावित नहीं होता, बल्कि उसका पूरा परिवार प्रभावित होता है. मरीज घूट-घूट कर मरने को विवश हो जाता है. जब तक इलाज चलता रहता है, तब तक सांस चलती रहती है. मगर फिर एक दिन आखिर सांसे थम जाती है. आज समाज में यह बीमारी बहुत तेजी से पांव फैला रही है. खासकर युवाओं में इस बीमारी ने अपनी जगह बनाना शुरू कर दी है. दो प्रमुख शब्द इस वक्त इस बीमारी के साथ जुड़ चुके हैं. जिसमें एक एमएसएम है और दूसरा पोर्न एप शामिल है.

लोहरदगा में एचआईवी पीड़ित मरीजों की संख्य बढ़ी

यह जानकर आपको हैरानी होगी कि एड्स आपके दरवाजे तक भी दस्तक दे चुका है. एड्स मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. यह बेहद खतरनाक है. उदाहरण के लिए हम लोहरदगा जिला के आंकड़ों को देख सकते हैं. एकीकृत परामर्श एवं परीक्षण केंद्र (आईसीटीसी) के अनुसार वर्तमान समय में एचआईवी एड्स के कुल 120 सक्रिय मरीज हैं. इस साल 2025 में अप्रैल महीने से लेकर अभी तक 12 नए मामले सामने आए हैं.

25 मरीजों की मौत

लोहरदगा जिला में जो सक्रिय मरीज हैं, उनमें 9 बच्चे, 36 महिलाएं और दो गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं. जबकि शेष पुरुष की संख्या है. इसमें एक बड़ी संख्या युवाओं की है. चिंतित करने वाली बात यह भी है कि हाल के वर्षों में एचआईवी से 25 मौतें हो चुकी हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर एड्स इतनी तेजी से कैसे फैल रहा है.

मरीजों की संख्या बढ़ने के कारण

आईसीटीसी (Integrated Counselling and Testing Centre) काउंसलर डॉक्टर अर्चना प्रसाद की मानें तो एचआईवी पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ने का सबसे बड़ा कारण मेल सेक्स विद मेल है. साथ ही इंटरनेट भी इसका एक बड़ा कारण है. गुमनाम एप के माध्यम से विद्यार्थी, किशोर और युवा आपस में संपर्क करते हैं. ग्रुप स्टडी के बहाने आपस में मिलते हैं और इसके बाद समलैंगिक यौन संबंध बनता है. जिसकी वजह से एचआईवी मरीजों की संख्या बढ़ रही है.

चलाया जा रहा जागरुकता अभियान

आईसीटीसी के माध्यम से लोगों के बीच लगातार जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. बीमारी से बचाव को लेकर लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है. समय-समय पर इसके लिए कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं. लोगों की जांच होती है. फिर भी यह बीमारी अपने पांव पसार रही है. विभाग जिन लोगों को नियमित दवा की सलाह देता है, वह या तो झोलाछाप के चक्कर में दवा खाना छोड़ देते हैं, या फिर वह नीम हकीम के चक्कर में पड़कर अपनी जान गंवा देते हैं. पलायन भी इस बीमारी के बढ़ने का एक बड़ा कारण है. लेकिन युवाओं में एमएसएम की बढ़ती प्रवृत्ति फिलहाल सबसे बड़ा खतरा है.