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गाजा युद्ध पर विराम के बाद अपने को बचाने में जुटे नेतन्याहू

भ्रष्टाचार मामले में राष्ट्रपति से माफी मांगी

तेल अवीवः इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने, जो देश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले प्रमुख हैं, अपने ऊपर लगे गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों से उत्पन्न होने वाली संभावित कानूनी कार्रवाई से खुद को बचाने के लिए राष्ट्रपति कार्यालय में औपचारिक रूप से क्षमादान (पार्डन) का अनुरोध प्रस्तुत किया है।

यह अनुरोध एक असाधारण और अत्यंत संवेदनशील राजनीतिक कदम माना जा रहा है, जिसने इज़रायल के कानूनी और सार्वजनिक परिदृश्य में एक बड़ा उबाल ला दिया है। नेतन्याहू पर इस समय तीन अलग-अलग, लेकिन आपस में जुड़े, मामलों में आरोप लगाए गए हैं। पहले में जिसमें उन्हें धनी व्यापारिक हस्तियों से महंगे उपहार जैसे सिगार और शैम्पेन लेने के बदले में सरकारी लाभ पहुँचाने का आरोप है।

दूसरे में एक प्रमुख इज़राइली समाचार पत्र के प्रकाशक के साथ कथित तौर पर सकारात्मक कवरेज के बदले में प्रतिस्पर्धा को कम करने की साजिश रचने का आरोप शामिल है। तीसरा आरोप सबसे गंभीर है। जिसमें नेतन्याहू पर रिश्वत लेने, सरकारी विनियमन लाभ के बदले में सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी के साथ पक्षपात करने का आरोप है। इन सभी मामलों की सुनवाई पिछले कई वर्षों से चल रही है, जिसमें जटिल साक्ष्य और कई गवाह शामिल हैं।

इज़राइली कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रधानमंत्री इन आरोपों में दोषी पाए जाते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। उन्हें न केवल तत्काल प्रभाव से प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है, बल्कि उन्हें एक महत्वपूर्ण जेल की सज़ा भी सुनाई जा सकती है। नेतन्याहू ने अपने बचाव में हमेशा यह दावा किया है कि ये सभी आरोप पूरी तरह से निराधार हैं और उनके राजनीतिक विरोधियों द्वारा उन्हें सत्ता से हटाने के लिए रचा गया एक सुनियोजित राजनीतिक प्रतिशोध है।

इज़रायल के राष्ट्रपति के पास देश के नागरिकों को क्षमादान देने का संवैधानिक अधिकार है। हालांकि, यह अधिकार आमतौर पर उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिनकी सजा न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद तय हो चुकी होती है। नेतन्याहू का अनुरोध अभूतपूर्व है क्योंकि उनका मामला अभी भी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है और अदालत ने कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।

नेतन्याहू का यह कदम राजनीतिक गलियारों में बड़े पैमाने पर विवाद का विषय बन गया है। विपक्ष और नागरिक समाज के समूह इस अनुरोध को न्याय से बचने का स्पष्ट प्रयास बता रहे हैं और लोकतंत्र तथा कानून के शासन पर हमले के रूप में इसकी निंदा कर रहे हैं। वे तर्क दे रहे हैं कि किसी भी पद पर आसीन व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए।

यह राजनीतिक ड्रामा ऐसे समय में सामने आया है जब नेतन्याहू सरकार इज़रायल-गाजा संघर्ष को लेकर अपने सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय दबाव का सामना कर रही है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय युद्धविराम और मानवीय सहायता को लेकर इज़रायल की नीतियों की आलोचना कर रहा है।

यदि राष्ट्रपति इस अनुरोध को स्वीकार कर लेते हैं, तो इससे इज़रायल की कानूनी व्यवस्था की स्वतंत्रता पर सवाल उठेंगे और यह देश की राजनीतिक और नैतिक संरचना पर गहरा, दीर्घकालिक असर डालेगा। यह फैसला इज़रायल के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित होगा।