सरकार में फेरबदल के स्पष्ट संकेत हैं
-
मंत्रिमंडल पर संभावित गाज
-
उल्टा रिजल्ट तो उल्टी राजनीति
-
मैया सम्मान योजना का आर्थिक बोझ
राष्ट्रीय खबर
रांचीः झारखंड की राजनीति में इस समय घाटशिला विधानसभा उप-चुनाव का परिणाम अत्यंत निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि इस उप-चुनाव का पलड़ा स्पष्ट रूप से सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के पक्ष में झुका हुआ प्रतीत हो रहा है। यदि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अगुवाई में झामुमो यह महत्वपूर्ण सीट जीत लेती है, तो माना जा रहा है कि इसका सीधा असर राज्य के मंत्रिमंडल फेरबदल पर पड़ेगा।
हेमंत सोरेन की सरकार में शामिल कुछ मंत्रियों के प्रदर्शन और सक्रियता को लेकर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में झामुमो की जीत मुख्यमंत्री को अपने मंत्रिमंडल का पुनर्गठन करने का अधिकार और अवसर देगी। सबसे पहले राजद कोटे से मंत्री बने सत्यानंद भोक्ता का टिकट कटने की संभावना है।
इसके अलावा, कांग्रेस खेमे के कुछ बड़बोले मंत्रियों और झामुमो कोटे के कुछ ‘सुस्त’ मंत्रियों के कामकाज से मुख्यमंत्री पर दबाव बढ़ा है। सूत्रों की मानें तो ये मंत्री मुख्यमंत्री के लिए बोझ बन चुके हैं, और जीत की स्थिति में वह निश्चित रूप से इन चेहरों को बदलकर अपनी टीम को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।
हालांकि संभावना कम है, लेकिन यदि यह उप-चुनाव भाजपा (एनडीए) के पक्ष में जाता है, तो राज्य के सारे राजनीतिक समीकरण तुरंत ही बदल जाएंगे। वर्तमान स्थिति यह है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के घटक दलों के नेता प्रचार के लिए घाटशिला पहुँच रहे हैं, जबकि सत्ताधारी इंडिया गठबंधन की ओर से वैसी सक्रियता देखने को नहीं मिल रही है।
यह सुस्ती चिंता का विषय है। अगर परिणाम अप्रत्याशित रूप से पलटते हैं, तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अपनी भावी राजनीति की रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा और गठबंधन के भीतर भी मंथन शुरू हो सकता है। कांग्रेस के नेता बिहार चुनाव में प्रचार करने में जुटे हैं पर उनकी घाटशिला में भागीदारी बहुत कम नजर आ रही है।
वर्तमान में हेमंत सोरेन की सरकार की महत्वाकांक्षी मैया सम्मान योजना (महिलाओं को 2500 की आर्थिक सहायता) के कारण उन्हें चुनावों में बढ़त मिलती दिख रही है। इस योजना का सीधा लाभ महिला मतदाताओं तक पहुँच रहा है, जिससे झामुमो का पक्ष मजबूत हुआ है। हालांकि, यह भी देखा जा रहा है कि कल्याणकारी योजनाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के कारण राज्य के सर्वांगीण विकास के अन्य कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
सरकार के भीतर और बाहर भी अफसरशाही पूरी तरह से चुप है, क्योंकि वहाँ भी राजनीतिक उथल-पुथल का माहौल बना हुआ है। राजनीतिक जानकार यह समझते हैं कि अन्य आवश्यक विकास कार्यों के रुकने से जनता में धीरे-धीरे नाराज़गी पैदा हो रही है। यदि इस असंतोष को जल्द नियंत्रित नहीं किया गया तो यह भविष्य में सरकार के लिए एक बड़ी परेशानी का सबब बन सकता है। ऐसे में घाटशिला का परिणाम सिर्फ एक सीट का नतीजा नहीं होगा, बल्कि यह राज्य की वर्तमान सरकार के कामकाज और आगामी राजनीतिक फैसलों की दिशा तय करेगा।