-
भाजपा ने रोहित पांडे को प्रत्याशी बनाया है
-
अर्जित शाश्वत चौबे निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे
-
कई और बागी भी मैदान में उतर सकते हैं
दीपक नौरंगी
भागलपुरः पूरे बिहार का विधानसभा चुनाव अपने चरम पर है, लेकिन भागलपुर विधानसभा सीट पर राजनीतिक घटनाक्रम ने इसे सबसे अधिक चर्चित और रोमांचक बना दिया है। भारतीय जनता पार्टी द्वारा मौजूदा उम्मीदवार रोहित पांडे के नाम की घोषणा करते ही, स्थानीय पार्टी इकाई में बड़े पैमाने पर बगावत और भितरघात की संभावनाएँ तेज़ हो गई हैं।
भागलपुर शहरी विधानसभा सीट हमेशा से अपने जटिल राजनीतिक समीकरणों, कांटे के मुकाबलों और दिलचस्प प्रतिस्पर्धा के कारण राज्य की सुर्खियों में रही है। हालिया विवाद की मुख्य वजह है भाजपा के कद्दावर और कई बार के विधायक तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के पुत्र अर्जित शाश्वत चौबे को पार्टी टिकट न मिलना। टिकट कटने के बाद अर्जित ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है, जिसने स्थानीय राजनीतिक परिदृश्य में बड़ी हलचल पैदा कर दी है।
देखें इससे संबंधित वीडियो
पिछले विधानसभा चुनाव (2020) में यह सीट बेहद करीबी मुकाबले का गवाह बनी थी। कांग्रेस के प्रत्याशी अजीत शर्मा ने भाजपा के रोहित पांडे को महज़ नौ सौ वोटों के मामूली अंतर से पराजित किया था। हार-जीत का यह छोटा अंतर इस सीट के मतदाताओं की संवेदनशीलता और संतुलित वोटिंग पैटर्न को स्पष्ट करता है, और अब यह समीकरण नए राजनीतिक रणनीतियों को प्रभावित करने वाला है।
स्थानीय सूत्रों और पार्टी के अंदरूनी गलियारों के अनुसार, भाजपा ने इस बार फिर से रोहित पांडे को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि अश्विनी चौबे के पुत्र अर्जित शाश्वत चौबे को दरकिनार कर दिया गया। इस निर्णय को पार्टी की नई चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, लेकिन चौबे गुट इसे उनकी निष्ठा और परिवार के योगदान के विरुद्ध लिया गया फैसला मान रहा है।
अर्जित शाश्वत चौबे ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर ली है और वे 17 अक्टूबर, 2025 को नामांकन पत्र दाखिल करने वाले हैं। उनके इस निर्णय से भाजपा के अंदर असंतोष और गुटबाजी की आशंकाएँ बढ़ गई हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अर्जित के निर्दलीय खड़े होने से भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सीधे सेंध लगेगी।
इसके अलावा, भाजपा की वरिष्ठ महिला नेता प्रीति शेखर और प्रशांत विक्रम सहित कई अन्य बागी तेवर वाले नेता भी निर्दलीय के रूप में मैदान में उतर सकते हैं। यदि पारंपरिक भाजपा वोट विभाजित होते हैं, तो इसका सीधा लाभ कांग्रेस प्रत्याशी अजीत शर्मा या किसी तीसरे मोर्चे को मिल सकता है। 2020 में हार-जीत का अंतर पहले ही बहुत कम था, ऐसे में वोटों का यह विभाजन कांग्रेस को मजबूत वापसी का मौका दे सकता है।
स्थानीय राजनीति में जातीय समीकरण, व्यक्तिगत संबंध, और क्षेत्रीय हितों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। अश्विनी चौबे जैसे वरिष्ठ नेता की व्यक्तिगत अपील अपने समर्थकों को एकजुट रख सकती है। यदि अर्जित शाश्वत चौबे एक मजबूत प्रचार अभियान के साथ चुनाव लड़ते हैं, तो भाजपा के लिए इस सीट को बचाना कठिन हो सकता है। हालांकि, यदि पार्टी अपने संगठन और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने में सफल रहती है, तो विभाजित वोटों के बावजूद जीत की संभावना बनी रह सकती है।