चुनाव आयोग और नीतीश कुमार दोनों दांव पर
आखिरकार, भारतीय चुनाव आयोग द्वारा बहुप्रतीक्षित बिहार विधानसभा चुनाव के विस्तृत कार्यक्रम की घोषणा होते ही राज्य की राजनीतिक सरगर्मियाँ अपने चरम पर पहुँच गई हैं। इस बार का चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक और चुनौतीपूर्ण है। पिछले दो दशकों में यह पहली बार है जब इतनी कम अवधि के भीतर, मात्र दो चरणों में मतदान संपन्न कराया जाएगा।
मतदान की तिथियाँ 6 नवंबर और 11 नवंबर निर्धारित की गई हैं, जबकि मतों की गिनती और नतीजों की घोषणा 14 नवंबर को होगी। चुनावी रणभूमि में सबसे बड़ा मुद्दा इस बार मतदाता सूची से जुड़ा है, जहाँ चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को लेकर उत्पन्न विवाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की राह में बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर रहा है।
चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव 2024 को सात चरणों में कराने के कड़वे अनुभवों से स्पष्ट रूप से सबक लिया है। विपक्षी दलों की लगातार माँग को ध्यान में रखते हुए, आयोग ने राज्य विधानसभा चुनावों को मात्र दो चरणों में समेटने का निर्णय लिया है। यह कदम चुनाव प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित और कम समय लेने वाला बनाने की दिशा में उठाया गया है।
हालाँकि, जिस तरह से आनन-फानन में और पर्याप्त तैयारियों के अभाव में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को अंजाम दिया गया, उस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। पारदर्शिता की कमी के चलते यह मामला बार-बार सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप का केंद्र बना रहा, जिसने चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
वर्तमान में, आयोग को उन असंख्य नागरिकों की शिकायतों का भी सामना करना पड़ रहा है, जिनके नाम मतदाता सूची से अचानक गायब हो गए हैं। यह चुनाव बिहार की राजनीति के ध्रुव नीतीश कुमार के लिए एक बड़ी परीक्षा है, जो पिछले दो दशकों से राज्य की सत्ता के केंद्र में बने हुए हैं। उन्हें इस बार संभावित सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है।
हालाँकि, एनडीए गठबंधन का नेतृत्व आशान्वित है कि हाल के दिनों में किए गए विकास कार्यों और लागू की गई लोक-लुभावनी योजनाओं की बदौलत वे मतदाताओं को लुभाने में सफल होंगे। दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनता दल और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सहित महागठबंधन ने अपने मतभेदों को दरकिनार करते हुए जिस एकजुटता का प्रदर्शन किया है, वह सुशासन बाबू के लिए निश्चित रूप से मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
इन चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की प्रतिष्ठा का भी सीधा मूल्यांकन होगा, क्योंकि यह परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए की ताकत को भी प्रभावित करेगा। वहीं, नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा भी दाँव पर है, क्योंकि यह परिणाम तय करेगा कि क्या वे रिकॉर्ड दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले पाएंगे।
इस बार विपक्ष ने भ्रष्टाचार और बिगड़ी कानून-व्यवस्था के सवाल को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया है। विडंबना यह है कि जिस मुद्दे (जंगल राज) पर नीतीश कुमार लंबे समय तक राजद की पिछली सरकारों को घेरते रहे हैं, वही अस्त्र अब महागठबंधन की ओर से उन्हीं पर चलाया जा रहा है। राजनीतिक परिदृश्य में एक नए खिलाड़ी के रूप में जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
उनकी पार्टी पलायन और भ्रष्टाचार जैसे जमीनी मुद्दों को अपना मुख्य चुनावी लक्ष्य बता रही है, जिससे पारंपरिक गठबंधनों के वोट बैंक में सेंध लग सकती है। विपक्ष लगातार यह तर्क दे रहा है कि एसआईआर विवाद ने मतदाताओं के बीच गहरा असमंजस पैदा कर दिया है। उनकी दलील है कि चुनाव में केवल कुछ ही हफ्ते शेष हैं, जबकि विशेष गहन पुनरीक्षण का पूरा मामला अभी भी न्यायिक जाँच के दायरे में है।
दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग से उन 3.66 लाख मतदाताओं का पूरा विवरण उपलब्ध कराने को कहा है, जिन्हें अंतिम मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है। 24 जून को एसआईआर अभियान शुरू होने के बाद से बिहार में मतदाताओं की संख्या में भारी फेरबदल देखा गया है। अभियान शुरू होने पर: 7.9 करोड़ मतदाता थे।
1 अगस्त को जारी मसौदा सूची में: यह संख्या घटकर 7.24 करोड़ रह गई। मृत्यु, प्रवास, और दोहराव जैसे विभिन्न कारणों के चलते 65 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए थे। अंतिम मतदाता सूची में: अब मतदाताओं की संख्या 7.42 करोड़ हो गई है। मसौदा सूची में 21.53 लाख नए नाम जोड़े गए हैं, जबकि कुल 3.66 लाख नाम हटाए गए हैं। अब यह आने वाला वक्त ही बताएगा कि महिलाओं, दिव्यांगों और बुजुर्गों के लिए की गई कल्याणकारी घोषणाओं का कितना लाभ सुशासन बाबू को मिलता है, या फिर बिहार का जनमानस महागठबंधन को सत्ता सौंपकर राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू करता है।