Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
दक्षिणी लेबनान को खाली करने से नेतन्याहू का इंकार राष्ट्रपति लूला तक अब बैंकिंग घोटाले की आंच पहुंची कांगो में इबोला संक्रमितों की संख्या 896 हुई युद्ध क्षेत्र में बच्चों के खिलाफ अत्याचार President Droupadi Murmu Birthday: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का जन्मदिन; पीएम मोदी, राजनाथ सिंह समेत... NEET Re-Exam Preparation: परीक्षा से पहले आज देशभर में NTA की 'मॉक ड्रिल'; जानें सुरक्षा और संचालन क... Karnataka Welfare Schemes: अब वोटर लिस्ट में नाम होने पर ही मिलेगा सरकारी योजनाओं का लाभ; सीएम डीके ... Economic Crisis Allegations: महंगाई और बेरोजगारी पर कांग्रेस का मोदी सरकार पर निशाना; RBI गवर्नर ने ... Maharashtra Politics: शिवसेना स्थापना दिवस पर शिंदे का शक्ति प्रदर्शन; राहुल गांधी और उद्धव गुट पर स... NEET UG Student Death: गाजियाबाद के प्रताप विहार में NEET की तैयारी कर रहे छात्र की मौत; जांच में जु...

दो पाटों के बीच पिसती हेमंत सरकार

कुड़मी आंदोलन के तुरंत बाद आदिवासी भी आंदोलन पर उतरे

  • एसटी सूची को लेकर है यह विवाद

  • दोनों ही झामुमो के असली वोट बैंक

  • एक भी खिसका तो पार्टी को परेशानी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड में कुड़मी जाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग अब एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष का रूप ले चुकी है। इस मांग के विरोध में आदिवासी समुदाय एकजुट होकर सड़कों पर उतर आया है। संयुक्त आदिवासी संगठन के बैनर तले हजारों आदिवासियों ने रांची स्थित राजभवन के सामने जोरदार प्रदर्शन किया, जिसमें उन्होंने कुड़मी संगठनों की मांग को अपने संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया।

प्रदर्शन में शामिल विभिन्न आदिवासी नेताओं ने अपनी बात रखते हुए स्पष्ट किया कि कुड़मी एक सक्षम और सशक्त समुदाय है और उन्हें आदिवासी सूची में शामिल करना, दशकों से हाशिए पर जीवन गुजार रहे मूल आदिवासियों के अधिकारों का हनन होगा। नेताओं ने ऐतिहासिक और कानूनी तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि कुड़मी जाति न तो कभी आदिवासी रही है और न ही वे अनुसूचित जनजाति बनने के मानदंडों को पूरा करते हैं।

आदिवासी नेताओं ने बताया कि ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1931 की जनगणना में भी कुड़मी समुदाय को आदिवासियों की श्रेणी से हटा दिया गया था। इसके अलावा, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी उनकी इस मांग को खारिज कर दिया था। इसके बावजूद, कुड़मी समाज का यह हठधर्मिता भरा रवैया आदिवासियों के बीच आक्रोश पैदा कर रहा है।

विरोध प्रदर्शन के दौरान, आदिवासी नेता लक्ष्मीनारायण मुंडा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि कुड़मी समुदाय की यह मांग, मूल आदिवासियों के आरक्षण, नौकरी, जमीन और उनके गौरवशाली इतिहास पर कब्जा करने की एक गहरी साजिश है। उन्होंने इसे आदिवासियों को उनके अपने ही घर में हाशिए पर धकेलने का एक षड्यंत्र बताया।

एक अन्य नेता निरंजन हेरेंज ने भी इस बात पर जोर दिया कि झारखंड के सभी 32 आदिवासी समुदाय एकजुट होकर इसका विरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि जब हमारे पूर्वज अंग्रेजों के सामने नहीं झुके, तो हम आज भी अपना हक किसी को छीनने नहीं देंगे। इस प्रदर्शन में रांची, जमशेदपुर, पश्चिमी सिंहभूम, गुमला, लोहरदगा, खूंटी, रामगढ़, हजारीबाग, सिमडेगा और पलामू जैसे कई जिलों से बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हुए।

सूरज टोप्पो, फुलचंद तिर्की, अमर तिर्की और हर्षिता मुंडा जैसे कई अन्य नेताओं ने भी इस मंच से अपनी बात रखी। विरोध प्रदर्शन के अंत में, संयुक्त आदिवासी संगठन ने राज्यपाल को एक चार सूत्री मांग पत्र भी सौंपा। इस पत्र में उन्होंने अपनी मांगों और कुड़मी समाज की मांग के विरोध के पीछे के कारणों को विस्तार से बताया।

इस परस्पर विरोधी मुद्दों के आंदोलनों को पहली बार हेमंत सरकार को कठिन चुनौतियों के समक्ष खड़ा कर दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन दोनों ही मजबूत वोट बैंकों पर झामुमो की अच्छी पकड़ है। इन वोट बैंकों में से किसी एक के भी हाथ से खिसक जाने से झामुमो को आगामी चुनावों में परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।