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असम की आंच से जल सकता है झारखंड में

बिगड़ रहे हैं महागठबंधन नेताओं के तेवर

  • असम में आदिवासी जनाधार

  • हेमंत की प्रचार को अच्छा समर्थन

  • कांग्रेस मानती है यह हिमंता की मदद है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः असम विधानसभा चुनाव में झामुमो के प्रत्याशियों के मैदान में डट जाने से उसका असर अब झारखंड में भी दिखने लगा है। झामुमो ने साफ तौर पर अपनी अलग पहचान के साथ वहां मैदान में प्रत्याशी उतारे हैं। इसे लेकर दोनों धड़ों के नेता अब बदले हुए सुर में बोलने लगे हैं। गनीमत है कि इस बार झामुमो ने पश्चिम बंगाल में अपने प्रत्याशी नहीं उतारे। पिछली बार बंगाल में चुनाव लड़ने का एलान कर हेमंत ने महागठबंधन को ही संकट में डाल दिया था, जिसे सुलझाने एक कद्दावर नेता को मुंबई से यहां आना पड़ा था।

झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम विधानसभा चुनाव 2026 में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए कुल 18 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं। पार्टी ने शुरुआती तौर पर 21 उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की थी, लेकिन नामांकन प्रक्रिया के दौरान 3 प्रत्याशियों के पर्चे रद्द हो जाने के कारण अब 18 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार मैदान में हैं।

पार्टी ने मुख्य रूप से उन सीटों को चुना है जहाँ झारखंडी मूल के चाय बागान मजदूरों और कुड़मी समाज की बहुलता है। झामुमो का मुख्य मुद्दा असम के चाय आदिवासी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाना है। असम में कांग्रेस और विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की संभावनाओं के विफल होने के बाद झामुमो ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।

पार्टी द्वारा जिन प्रमुख सीटों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, उनमें मजबत, विश्वनाथ, सोनारी, डिगबोई और रांगापाड़ा शामिल हैं। चुनावी अभियान की कमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने संभाली है, जो विशेष रूप से ऊपरी असम के आदिवासी बहुल इलाकों में सक्रिय हैं। हेमंत की इस चाल का असम की राजनीति में साफ असर भी दिख रहा है। कई पीढ़ी पहले यहां के जो आदिवासी चाय बगान में काम करने असम चले गये थे, वैसे लोगों की वर्तमान पीढ़ियां राजनीतिक तौर पर सक्रिय है। लिहाजा हेमंत के चुनाव प्रचार में इसका असर दिख रहा है।

दूसरी तरफ कांग्रेस के लोग मान रहे हैं कि इससे सिर्फ भाजपा विरोधी वोटों का बंटवारा हो रहा है, जो हिमंता बिस्वा सरमा की जीत का रास्ता खोलता है। लेकिन कांग्रेस ने अपनी तरफ से हेमंत के सामाजिक समीकरण को पहले समझने की पहल तक नहीं की।

इसका नतीजा है कि असम का चुनावी दंगल झारखंड की राजनीति पर भी असर डाल रहा है। दोनों के दलों के नेताओं के बयान कुछ ऐसे आये हैं, जिससे रिश्तों में तल्खी साफ झलक जाती है। अब यह देखना रोचक है कि असम चुनाव के निपट जाने के बाद झामुमो और कांग्रेस की दोस्ती झारखंड में कितने दिनों तक टिक पाती है।