निजता का अधिकार या कुछ छिपाने की दलील
मुख्य चुनाव आयुक्त ने सीसीटीवी फुटेज के मामले में अजीब बयान देकर सभी को हैरान कर दिया। इसके ठीक बाद ही उपराष्ट्रपति के चुनाव में मतदान करती अनेक महिलाओं के फोटो और वीडियो वायरल हो गये। इससे जो नया सवाल खड़ा हुआ, वह यह है कि यह निजता का अधिकार है अथवा किसी जुर्म को छिपाने की साजिश।
हम वाकई एक अजीब दौर में जी रहे हैं, जहाँ हर नए कार्यकारी आदेश या अदालती फ़ैसले के साथ तर्क के नियम हर रोज़ उलट-पुलट हो रहे हैं। सबसे ताज़ा है गोपनीयता की यह नई महामारी—ज़ाहिर है, एकतरफ़ा।
एक तरफ़, सरकार अपने नागरिकों से आधार, पैन, मतदाता पंजीकरण, चेहरा पहचान, डिजीयात्रा के ज़रिए, टैक्स अधिकारियों को हर किसी के सोशल मीडिया चैट और ईमेल खंगालने, और आयातित स्पाईवेयर के ज़रिए उनके फ़ोन वार्तालापों पर नज़र रखने के लिए अधिकृत करके, हर संभव कोशिश कर रही है।
दूसरी तरफ़, वह उन्हीं नागरिकों के साथ वह जानकारी साझा करने से इनकार कर रही है जिसके वे हक़दार हैं ताकि वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का सार्थक प्रयोग कर सकें। दूसरे शब्दों में, नागरिक को निजता का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन सरकार को इस पर संप्रभु अधिकार है! जब आप नूडल्स का एक पैकेट खरीदते हैं, तो आपको क़ानूनन यह जानने का हक़ है कि उसमें क्या है।
लेकिन जब आप अपना प्रधानमंत्री चुनते हैं—जो कि एक ज़्यादा महत्वपूर्ण फ़ैसला है, तो आप मानेंगे—तो आपको यह जानने का हक़ नहीं है कि उनके पास वैध शैक्षणिक योग्यता है या नहीं। हालाँकि उन्होंने अपने चुनावी नामांकन पत्र में इसकी घोषणा की है, फिर भी इसे उनके सांचो पांजा द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रदर्शित किया गया है और कई अखबारों में प्रकाशित किया गया है!
क्योंकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि यह निजी जानकारी है और इसे प्रकट करने से कोई जनहित नहीं सधता। इस फैसले में तार्किक असंगति और भ्रांतियों के इतने सारे सूत्र हैं कि उन्हें अलग करना मुश्किल है।
पहली बात तो यह कि सार्वजनिक जीवन में कोई व्यक्ति उन मामलों में गोपनीयता का दावा नहीं कर सकता जो उसके चरित्र या कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं, जैसे कि शैक्षणिक योग्यता, आय और उसके स्रोत, वैवाहिक स्थिति, उसके परिवार के सदस्यों की भौतिक स्थिति, उसका कोई आपराधिक इतिहास तो नहीं… ये विवरण जनता के लिए यह तय करने के लिए आवश्यक हैं कि उस पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं।
दूसरा, उन्होंने यह जानकारी सरकार (इस मामले में, चुनाव आयोग) को शपथ पत्र पर पहले ही बता दी है और अब यह निजी नहीं है। तीसरा, इस तरह के खुलासे को न केवल चुनाव प्राधिकरण, बल्कि मतदाता की भी संतुष्टि के लिए ठीक से सत्यापित किया जाना चाहिए। चौथा, अदालत के इसी गलत तर्क के अनुसार, उम्मीदवार द्वारा दी गई अन्य सभी जानकारी की पुष्टि या सार्वजनिक नहीं की जा सकती।
अगर मकसद इसे बंद रखना है, तो फिर यह जानकारी माँगने की क्या ज़रूरत है? इस फैसले का तर्क चुनाव कानूनों और मतदाताओं के अधिकारों का मज़ाक उड़ाता है। दरअसल, अदालत हमें यह बता रही है कि हमें किसी उम्मीदवार के बारे में कोई भी जानकारी पाने का कोई अधिकार नहीं है और हम किसी बेवकूफ़ को चुन सकते हैं!
इस बीच, संदिग्ध रूप से गठित भारतीय चुनाव आयोग ने अपारदर्शिता और गोपनीयता के नए मानक स्थापित किए हैं, जो मतदाताओं के साथ कोई भी सार्थक या समय पर जानकारी साझा करने से इनकार कर रहा है, चाहे वह डाले गए वोटों की संख्या हो, वीवीपीएटी की गिनती हो, मशीन-पठनीय मतदाता सूचियाँ हों, बिहार में जल्दबाजी में SIR (विशेष सारांश संशोधन) को प्रेरित करने वाले कारण हों, एसआईआर में 65 लाख बाहर किए गए मतदाताओं के नाम और उनकी विलोपन के कारण हों, या अंततः पता लगाए गए बांग्लादेशियों की संख्या हो (एसआईआर का एक बताया गया कारण)। जब भी इसने कोई जानकारी दी है, तो उसने अनिच्छा से और अदालतों के कहने पर ही ऐसा किया है।
अब नियमों के अपने फायदे के लिए तोड़ने मरोड़ने का यह खेल नई पीढ़ी तो क्या खेतों में मोबाइल लेकर भोजपुरी गाना सुनने वालों के लिए भी बेकार हो चुका है। पता नहीं सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को बार बार यह भ्रम क्यों होता रहता है कि देश की जनता इन बातों को नहीं समझती। अब तो पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी नजर आ गये हैं। लिहाजा सूत्रों के हवाले से भारत में ही रहने वाले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार भी सामने आये तो पारदर्शिता के साथ अनुत्तरित सवालों का उत्तर मिल जाएगा। वरना परिस्थितियां कुछ ऐसी हैं कि अगले दो दिनों के भीतर वाकई राहुल गांधी का हाईड्रोजन बम फटने जा रहा है।