तुमको जो पसंद वही बात वाली बात पर अब शीर्ष अदालत ने हथौड़ा चला दिया। भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) ने गुरुवार (21 अगस्त, 2025) को सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि उसके सार्वजनिक नोटिस में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि बिहार मतदाता सूची के मसौदे में नाम शामिल न होने से व्यथित मतदाता अपने दावों के साथ आधार कार्ड की प्रतियाँ प्रस्तुत कर सकते हैं।
ईसीआई द्वारा स्थिति रिपोर्ट दर्ज करने के लिए दायर आवेदन न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ द्वारा 14 अगस्त को पारित एक अंतरिम आदेश के बाद आया है, जिसमें चुनाव आयोग को चुनावी राज्य बिहार में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के दौरान मतदाता सूची के मसौदे में शामिल न किए गए लगभग 65 लाख मतदाताओं की बूथवार गणना की गई सूची प्रकाशित करने का निर्देश दिया गया था।
ईसीआई ने कहा कि बिहार में 1 अगस्त को प्रकाशित मसौदा सूची में शामिल न किए गए 65 लाख मतदाताओं के नाम और विवरण राज्य के सभी 38 जिला निर्वाचन अधिकारियों की वेबसाइटों पर पोस्ट कर दिए गए हैं। सूची में उनके शामिल न किए जाने के कारण भी शामिल हैं, जिनमें मृत्यु, सामान्य निवास का स्थानांतरण या डुप्लिकेट प्रविष्टियाँ शामिल हैं।
सूची की भौतिक प्रतियाँ बिहार के गाँवों में पंचायत भवनों, खंड विकास कार्यालयों और पंचायत कार्यालयों में प्रदर्शित की गई हैं ताकि लोग आसानी से उन तक पहुँच सकें और पूछताछ कर सकें। चुनाव आयोग ने कहा कि सूचियों की ऑनलाइन उपलब्धता के बारे में प्रमुख समाचार पत्रों, रेडियो और टेलीविजन पर विज्ञापन जारी किए गए हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए हैं।
न्यायालय ने बिहार के मतदाताओं के जानने के अधिकार और लोकतंत्र में मतदाता सूची में बने रहने के उनके संवैधानिक अधिकार को बरकरार रखा। अदालत ने कहा, लोगों को जानने का अधिकार है। मतदाताओं का विश्वास जगाने के लिए उच्च स्तर की पारदर्शिता आवश्यक है। बहिष्कृत मतदाताओं के नाम, कारण सहित, सभी के लिए सार्वजनिक डोमेन में प्रकाशित करें, न्यायालय ने चुनाव आयोग को संबोधित करते हुए कहा था।
65 लाख नाम मसौदा सूची से हटा दिए गए, जबकि उनके नाम कुछ ही महीने पहले, जनवरी 2025 में, एक संक्षिप्त संशोधन के बाद तैयार की गई मतदाता सूची में शामिल थे। 14 अगस्त के आदेश में न्यायालय ने पहली बार औपचारिक रूप से बिहार एसआईआर प्रक्रिया में पहचान और निवास के प्रमाण के रूप में आधार के उपयोग का निर्देश दिया था। आधार पहचान और निवास का एक वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त साधन है। इसे एक दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, न्यायालय ने मौखिक रूप से टिप्पणी की थी।
इसी बात पर फिल्म सफर का यह गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था इंदीवर ने और संगीत में ढाला था कल्याणजी आनंद जी ने। इसे मुकेश कुमार ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल इस तरह हैं।
जो तुमको हो पसंद, वही बात करेंगे
तुम दिन को अगर रात कहो, रात कगेंगे
जो तुमको …
चाहेंगे, निभाएंगे, सराहेंगे आप ही को
आँखों में दम है जब तक, देखेंगे आप ही को
अपनी ज़ुबान से आपके जज़बात कहेंगे
तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे
जो तुमको हो पसंद …
देते न आप साथ तो मर जाते हम कभी के
पूरे हुए हैं आप से, अरमान ज़िंदगी के
हम ज़िंदगी को आपकी सौगात कहेंगे
तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे
जो तुमको हो पसंद …
जो तुमको हो पसंद …
कुल मिलाकर अचानक सुप्रीम कोर्ट ने इस सुंदर गीत के गति पर लगाम लगा दिया और कहा कि लोगों को जानने का हक है इसलिए सूची सार्वजनिक करने के साथ साथ आधार कार्ड को भी इस प्रक्रिया में जोड़ लें। दूसरी तरफ राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की जोड़ी लगातार बिहार में वोट चोरी के आरोप को हवा देने में जुटी है।
ऐसा नहीं है कि इस प्रचार का असर नहीं हो रहा है। मोदी समर्थक भी जी जान से खंडन करने में जुटे हैं और बेचारा चुनाव आयोग इस विवाद में वाकई केचुआ साबित हो रहा है। बड़ी मुश्किल से सब कुछ किया था लेकिन एक अदालती आदेश ने सब किये पर पानी फेर दिया। दूसरी तरफ मुर्दा लोग सुप्रीम कोर्ट में हाजिर होकर सारे दावों का हवा निकालने में कोई कसर नहीं छोड़े।
अब तो सीसीटीवी फुटेज में निजता के हनन की दलील का भी सोशल मीडिया में मजाक बन रहा है। शायद इसी को कहते हैं समय का खराब होना जब रस्सी भी अचानक सांप बन जाए। जगदीप धनखड़ का इस्तीफा अचानक से ऐसा उथल पुथल पैदा कर गया कि भाजपा के अंदर क्या कुछ हो रहा है, इसे भी संभालने में ताकत लगाना पड़ रहा है।