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अब शान से अपनी पगड़ी बांध रहे हैं सूरोजी कांजी सोढा

पाकिस्तान के 185 लोगों को भारतीय नागरिकता

  • भारत की नई पहचान: एक नया सवेरा

  • सिंध प्रांत में सबकुछ छोड़कर यहां आये थे

  • वर्ष 2009 से उनका संघर्ष अब मुकाम पर

राष्ट्रीय खबर

अहमदाबादः गुजरात के कच्छ जिले में जूरा कैंप के बाहरी इलाके में, 70 वर्षीय सूरोजी कांजी सोढा अपनी मिट्टी की झोपड़ी, जिसे भुंगा कहते हैं, के बाहर गहरी साँस लेते हैं। यह साँस 16 साल के इंतजार और अनिश्चितता के बाद मिली राहत की थी। वे कहते हैं, यह दूसरा जन्म जैसा लगता है। सूरोजी और उनकी पत्नी ताजू कौर उन 185 पाकिस्तानी नागरिकों में शामिल हैं, जिन्हें 25 जुलाई को भारतीय नागरिकता दी गई। यह सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक पहचान, एक घर और एक सम्मान की वापसी थी।

सूरोजी की कहानी 2009 में शुरू हुई, जब उन्होंने पाकिस्तान के सिंध प्रांत में अपना सब कुछ छोड़ने का फैसला किया। लगभग 40 एकड़ ज़मीन, पशुधन और पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली पीछे छूट गई। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन अपने बच्चों, खासकर अपनी बेटियों के लिए एक बेहतर और सम्मानजनक भविष्य की तलाश में उन्होंने यह कदम उठाया। अपनी पत्नी और आठ बच्चों के साथ, वे भारत आने वाली ट्रेन में सवार हुए। अपनी जन्मभूमि को छोड़ना कितना मुश्किल था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी वे दिहाड़ी मजदूरी करके रोज 300 रुपये कमाते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर एक अलग ही सुकून है।

भारत में आने के बाद, इन परिवारों ने एक नए जीवन की शुरुआत की। उनका संघर्ष और इंतजार लंबा था, लेकिन आज जब उन्हें नागरिकता का प्रमाण पत्र मिला, तो उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे। उनके लिए यह सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक सम्मान का प्रतीक था। नागरिकता मिलने के बाद, अब वे भारत के नागरिक के रूप में हर अधिकार का उपयोग कर सकते हैं, चाहे वह सरकारी योजनाओं का लाभ हो, बच्चों की शिक्षा हो, या फिर रोज़गार का अवसर।

इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत उन लोगों के लिए हमेशा खुला रहा है, जो यहां सम्मान और सुरक्षा की तलाश में आते हैं। यह न केवल इन परिवारों के लिए एक नई शुरुआत है, बल्कि यह भारत की उदारता और मानवीयता का भी प्रतीक है। सूरोजी जैसे लोग, जिन्होंने अपने वतन में सम्मान खोया, उन्हें भारत में वह सम्मान मिला जिसकी वे हमेशा से तलाश में थे। यह एक ऐसी कहानी है जो हमें बताती है कि नागरिकता सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक मानवीय भावना भी है। यह उन लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण है, जो आज भी बेहतर जीवन की तलाश में हैं।