चुनौतियों अधिक कठिन तो एकजुटता जरूरी है
रजत कुमार गुप्ता
अचानक से वैश्विक परिदृश्य में भारत सहित अधिसंख्य विकासशील देशों की स्थिति बदल चुकी है। इसका एक कारण अमेरिकी टैरिफ है, जो कई देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने जा रही है। लिहाजा वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए पूरे देश को एकजुट रहना जरूरी है। इस एकजुटता की प्राथमिक शर्त चंद लोगों के फायदे के बदले पूरे देश का कल्याण है और यह जिम्मेदारी सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी सरकार की है।
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने के साथ साथ हमें भविष्य की पीढ़ी के बारे में भी सोचना होगा जबकि असली चुनौती वर्तमान की हैं। देश ने 1967 के अकाल के अलावा कोरोना महामारी को भी देखा है और उसका मुकाबला भी किया है। दोनों की यादें ताजी हैं और कमसे कम नई पीढ़ी को कोरोना लॉकडाउन के दौरान पैदल अपने घर की तरफ जाते लोगों को रास्ते में अनजान लोगों की मदद का एहसास याद रखना चाहिए।
अगर देश के सामने नई किस्म की चुनौती है तो हम इसी तरीके से मिलकर भी इसका मुकाबला कर सकते हैं पर यह याद रहे कि हम खेती के मुद्दे पर अमेरिका के आगे झूके तो हमारी अगली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। अमेरिका की नाराजगी की खास वजह उसके जीएम बीजों के कारोबार को भारत में बढ़ावा नहीं मिलना भी है।
जो अमेरिका कभी अकाल पीड़ित भारत को पशुओं के चारे के तौर पर इस्तेमाल होने वाला गेंहू हमें भेजता था, उसके पीछे छिपे राज को अब तो हम जान चुके हैं। इस गेंहू के साथ देश में पार्थेनियम यानी गाजर घास का आना और उसका देश की मिट्टी पर कैसा असर हुआ, इसे हमने देखा है। ऐसे में हमने अपनी अपनी पारंपरिक खेती को छोड़ अमेरिकी जीएम बीजों पर खुद को निर्भर बना लिया तो अंततः हम खेती के मामले में भी उसी पूंजीवादी देश पर पूरी तरह निर्भर हो जाएंगे, जो देश हित में नहीं होगा।
दुनिया में चारों तरफ देखना और समझना आज के इंटरनेट युग में आसान औऱ त्वरित हो गया है। लिहाजा हम अपने विवेक का इस्तेमाल कर यह तय कर सकते हैं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है। नाजी विस्तार के दौर में जिस तरीके से लोगों के दिमाग को प्रभावित किया गया है, वह तरीके आज भी काम करते हैं।
इसलिए भारत की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने दिमाग की खिड़की खुली रहे, ताजी सोच को आने दें तथा समाज को बांटने वाली चीजों से खुद को दूर करें, यही हमारी आजादी को कायम रख पायेगा। अगर बंट गये तो मुगल साम्राज्य और ब्रिटिश शासन का उदाहरण हमारे सामने मौजूद है।
दूसरी तरफ हम यह भी देख और समझ सकते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देश की एकजुटता का वैश्विक प्रभाव क्या हुआ है और इस एकजुटता ने हमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में कितनी मदद पहुंचायी है। तमाम मतभेदों को भूलाकर देश एकजुट क्या हुआ, डोनाल्ड ट्रंप जैसा छिपा हुआ दुश्मन भी मजबूरी में खुलकर सामने आ गया और उसके बाद के घटनाक्रम कैसे रहे, यह बताने की जरूरत नहीं है।
दरअसल हवा हवाई बातों से कूटनीतिक रिश्ते नहीं निभाये जाते, इस बात का अनुभव तो अब देश की वर्तमान सत्ता को हो चुका होगा। अमेरिका एक ही डंडे से पूरी दुनिया को हांकना चाहता है और उसका एकमात्र मकसद अपने हथियारों की बिक्री को बढ़ावा देना होता है। वहां सत्ता में चाहे कोई भी रहे लेकिन वहां का लोकतंत्र दरअसल वहां की बड़ी कंपनियों के कारोबार को लाभ पहुंचाने वाली है। भारत भी इसी रास्ते पर अगर आगे बढ़ने की कोशिश करता है तो यह हमारे देश के लोकतांत्रिक ढांचे के अनुकूल नहीं है, इस बात को हमें समझना होगा।
कभी इराक के पास रासायनिक हथियार होने का बहाना बनाकर उस पर हमला करने वाला देश यानी अमेरिका अब अपने ही देश में पाकिस्तानी जनरल असीम मुनीर के उस बयान को नजरअंदाज करता है, जिसमें उन्होंने अपने परमाणु हथियार से आधी दुनिया को तबाह करने की बात सार्वजनिक तौर पर कही है। इससे भी हम समझ सकते हैं कि हमारे पड़ोस में जो आतंकवादी चुनौती पनपती रही है, उसके पीछे किसका हाथ है। वैसे भी यह जगजाहिर है कि पूरी दुनिया में आतंकी गतिविधियों में जो हथियार पहुंच रहे हैं, उसमें अमेरिका की क्या भूमिका है।
भारत को अपने नागरिकों की बदौलत आगे बढ़ने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा को सबसे बेहतर बनाने की जरूरत है। दूसरी तरफ पूंजी के असमान बंटवारे के वर्तमान तौर तरीकों से देश को रास्ता बदलना होगा ताकि आर्थिक तरक्की का लाभ पूरे देश को मिले। इसके बिना आजादी के असली मायने सच्चाई से कोसों दूर रह जाएंगे।