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स्वतंत्रता के मूल से हटाने का प्रतिरोध जरूरी

भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास कोई थाली में परोसी हुई वस्तु नहीं रही है। इसे काफी लंबे संघर्ष और वलिदान के बाद ही हासिल किया गया है। अब इतिहास का पुनर्लेखन करने की जिम्मदारी उठाने वाले इसके बारे में अलग अलग तर्क देकर उस रक्तरंजित इतिहास को सफेद पन्नों में तब्दील करना चाहते हैं, जिसमें लाखों शहीदों का खून शामिल है। हमें इससे सजग होना होगा।

यह गलत नहीं है कि हम किसी भी अपनी मान्यता से भिन्न विचारधारा को सुने। हर किसी की सुनने से तर्कशीलता बढ़ती है। इसमें सिर्फ यह सामाजिक शिक्षा जरूरी है कि हर सूचना को हम अपनी कसौटी पर जांचे परखें। वर्तमान में देश की हालत कुछ ऐसी हो गयी है कि समाज का एक बड़ा वर्ग सोचने समझे की शक्ति खो चुका है।

सबसे अधिक वैसे लोग हैं, जो पड़ोसी के घर में आग लगने का तर्क देकर इससे बचने की कोशिश करते हैं। यह दरअसल समाज को पंगु बनाने की एक गहरी साजिश है। अभी चंद लोगों पर यह प्रयोग चल रहा है और धीरे धीरे जैसे जैसे ताकत बढ़ती जाएगी लोगों के दमन और बहस की गुंजाइश खत्म कर दी जाएगी।

भारतीय स्वतंत्रता को कायम रखने में भारतीय संविधान का महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए संविधान में वर्णित मूलभूत सिद्धांतों से अलग छेड़छाड़ होता है तो यह दरअसल भारतीय अस्मिता के साथ खिलवाड़ ही है, इस बात को हर किसी को गांठ बांध लेना चाहिए। लोकतंत्र में अलग अलग विचारधाराओं की गुंजाइश इसी सोच के साथ बनायी गयी है ताकि हम अपने आप में निरंतर सुधार कर सकें।

यह दिन भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1947 में इस दिन देश ने अंग्रेजी शासन से आजादी हासिल की थी। स्वतंत्रता दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों ने कैसे शक्ति, संघर्ष और संकल्प से स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी थी। यह दिन हमें देशभक्ति, साहस और समर्पण के महत्व को समझाता है।

अब उस इतिहास को भूलाने से हम ठीक पाकिस्तान जैसी स्थिति में पहुंच जाएंगे, जिसने अपनी इतिहास और विरासत को भूलाकर अपनी अगली पीढ़ियों को जड़ों से काट दिया। उसका नतीजा क्या है, यह हम देख रहे हैं।

दूसरी तरफ इतिहास की गलत व्याख्या का नतीजा यह देश मणिपुर में देख रहा है। इस तरीके से हमारे पास अनेक ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जो हमें यह बताते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्ति का काम कोई लॉटरी खुलने जैसा नहीं था। गुजरे दशकों में हासिल हुई अपनी उपलब्धियों पर गौरवान्वित होना स्वाभाविक ही है।

दो सौ साल तक ब्रिटिश उपनिवेशवाद का दंश झेलने के बाद देश आर्थिक रूप से लगभग जर्जर अवस्था में पहुंच गया था। धार्मिक आधार पर हुए देश के बंटवारे और उस क्रम में हुई हिंसा ने देश में अभूतपूर्व सांप्रदायिक संकट खड़ा कर दिया। वैसे गहन चुनौती से भरे माहौल में 15 अगस्त 1947 को भारतवासियों ने सदियों के बाद स्वतंत्र माहौल में सांस लेते हुए सूरज की पहली किरणें देखीं।

वहां से नियति से मिलन की जो यात्रा शुरू हुई, उसकी कुछ मंजिलें भले अभी भी दूर हों, मगर हमने उसमें कई अहम मुकामों को हासिल किया है। वैश्विक महामारी का अनुभव इस स्वतंत्र देश ने पहली बार किया और जाना कि कई बार भीषण संकट बिना किसी पूर्व सूचना के भी आती है जब सरकारी व्यवस्थाएं भी पूरी तरह ध्वस्त हो जाती है। लेकिन हमने यह भी देखा कि इस संकट काल में जब सरकार लाचार था, जनता ने एक दूसरे का हाथ थामा और सहारा दिया।

उस वक्त हमने जात, धर्म और क्षेत्रवाद से परहेज किया। यही असली भारतवर्ष है। लाल किले से प्रधानमंत्री का संबोधन आम भाषण नहीं होता। बल्कि राष्ट्रीय गौरव के अवसर पर यह राष्ट्र के सामने उसके नेता का उद्बोधन होता है। देश इसके जरिए यह जानने की अपेक्षा रखता है कि संवैधानिक उद्देश्यों को पूरा करने को लेकर राजनीतिक नेतृत्व की सोच क्या है?

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने के मूल विषय पर इस बार जिस तरीके से नरेंद्र मोदी ने लापरवाही और उदासीनता दिखायी है, उससे कई सवाल खड़े हो गये हैं और देश में मोदी की लोकप्रियता को भी चोट पहुंची है।दरअसल हमें बार बार इस बात को याद रखना होगा कि भारतीय संविधान में निहित लक्ष्य हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान विकसित हुए।

सबके लिए न्याय, सभी नागरिकों की बुनियादी स्वतंत्रताओं को सुनिश्चित करना और सबको समान अवसर मुहैया कराना इनमें सर्वप्रमुख हैं। इन्हीं मकसदों ने हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य को विशेष स्वरूप दिया है। लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई हर सरकार इन उद्देश्यों से बंधी होती है। अपने कार्यकाल में इन मकसदों को हासिल करने की दिशा में वह कितनी आगे बढ़ी, यही उसके मूल्यांकन की कसौटी रही है। हमारी राजनीतिक समझदारी का लोहा सारी दुनिया ने माना है। स्वतंत्रता दिवस वह मौका है, जब हम इसके महत्व पर जोर दें और लगातार गहराई देने का संकल्प लें। सतत जागरूकता ही स्वतंत्रता की गारंटी होती है।