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सेवानिवृत्ति के बाद कोई सरकारी पद नहीः सीजेआई गवई

पैतृक गांव पहुँचने पर मुख्य न्यायाधीश का भव्य स्वागत 

  • दारापुर को नई न्यायिक इमारत मिली

  • कुर्सी सिर में घुस गयी तो न्याय खत्म

  •  वकीलों को भी स्पष्ट संदेश दिया उन्होंने

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः दारापुर और अंजनगांव क्षेत्र के लिए यह न्यायिक इमारत एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अट्ठाईस दशमलव पाँच चार करोड़ रुपये की लागत से बनी इस नई इमारत में अब दीवानी (सिविल) और फौजदारी (आपराधिक) दोनों तरह के मामलों की सुनवाई की जाएगी। उद्घाटन कार्यक्रम में न्यायाधीशों के साथ-साथ जिले के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी, अधिवक्ता संघ के सदस्य और बड़ी संख्या में आम नागरिक उपस्थित थे।

सीजेआई गवई ने अपने पूरे भाषण के दौरान इस बात पर जोर दिया कि चाहे वह जिलाधिकारी की कुर्सी हो, पुलिस अधीक्षक की हो या न्यायाधीश की हो, हर पद केवल और केवल जनसेवा का माध्यम है। उन्होंने दो टूक कहा, कुर्सी सिर में घुस गई, तो न्याय का मोल खत्म हो जाएगा। ये कुर्सी सम्मान की है, इसे घमंड से अपमानित न करें। उनका यह संदेश स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सत्ता का दुरुपयोग नहीं, बल्कि विनम्रता और सेवा ही सच्ची गरिमा है

इस कार्यक्रम के दौरान, सीजेआई गवई ने अपने भविष्य की योजनाओं का भी खुलासा किया। अपने पैतृक गांव दारापुर पहुँचने पर ग्रामीणों ने उनका भव्य स्वागत किया। उन्होंने अपने पिता, केरल और बिहार के पूर्व राज्यपाल आरएस गवई की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की और उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया।

सीजेआईगवई ने घोषणा की कि वह इस वर्ष नवंबर में अपनी सेवानिवृत्ति के बाद कोई भी सरकारी पद स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, मैंने निर्णय लिया है कि सेवानिवृत्ति के बाद मैं कोई सरकारी पद स्वीकार नहीं करूंगा। सेवानिवृत्ति के बाद मुझे अधिक समय मिलेगा, इसलिए मैं दारापुर, अमरावती और नागपुर में अधिक समय बिताने का प्रयास करूंगा। यह घोषणा उनके सिद्धांतों और जनसेवा के प्रति उनके अटूट समर्पण को और मजबूत करती है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश गवई ने महाराष्ट्र के दर्यापुर (अमरावती) में एक नव-निर्मित न्यायालय भवन के उद्घाटन समारोह में न्यायपालिका, प्रशासन और अधिवक्ता समुदाय को एक महत्वपूर्ण और सीधा संदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पद केवल जनता की सेवा के लिए होते हैं, न कि घमंड के लिए। सीजेआईगवई ने कहा, कुर्सी अगर सिर में चढ़ जाए, तो यह सेवा नहीं, बल्कि पाप बन जाती है। उनका यह बयान न्यायपालिका और प्रशासनिक पदों पर बैठे सभी व्यक्तियों के लिए एक चेतावनी की तरह था।

सीजेआईगवई ने केवल प्रशासनिक अधिकारियों को ही नहीं, बल्कि न्यायाधीशों और वकीलों को भी उनके आचरण पर ध्यान देने की बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा, न्यायाधीशों को वकीलों का सम्मान करना चाहिए। यह अदालत वकील और न्यायाधीश दोनों की होती है। उन्होंने युवा वकीलों को भी विनम्रता का पाठ पढ़ाया, जब उन्होंने कहा, पच्चीस साल का वकील कुर्सी पर बैठा होता है और जब सत्तर साल का सीनियर आता है, तो उठता भी नहीं। थोड़ी तो शर्म करो! सीनियर का सम्मान करो। यह टिप्पणी न्याय पेशे में सम्मान और वरिष्ठता के महत्व को दर्शाती है।