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इससे लोगों का भरोसा डगमगा रहा हैः न्यायमूर्ति गवई

जज के पद से रिटायर होने के बाद राजनीतिक पद पर टिप्पणी

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः रिटायरमेंट के बाद जजों के राजनीति में आने से लोगों का भरोसा डगमगा रहा, चीफ जस्टिस चिंतित है। कुछ तो रिटायरमेंट के बाद सीधे राजनीति में आ जा रहे हैं। इस बार खुद चीफ जस्टिस बीआर गवई ने जजों के इस चलन पर चिंता जताई है। उ

नका कहना है, अगर कोई जज रिटायरमेंट के बाद कोई दूसरा सरकारी पद लेता है, या जज की सीट छोड़कर राजनीति में आता है तो इससे नैतिकता पर बड़ा सवाल उठता है।

केंद्र में मोदी काल में जजों को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले कई तरह के पदों को लेकर काफी बहस हुई है। जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस रंगनाथन मिश्रा राज्यसभा के सदस्य बने। अभिजीत गंगोपाध्याय जज की सीट से रिटायर होने के कुछ दिनों बाद ही भाजपा में शामिल हो गए। बाद में वे लोकसभा से सांसद बने।

बेशक, सिर्फ मोदी काल में ही नहीं, कई जजों को रिटायरमेंट के बाद भी कई पद मिले हैं। इनमें जस्टिस एएम थिप्से, जस्टिस विजय बहुगुणा, जस्टिस एम रामा जॉयस, जस्टिस राजिंदर सच्चर, जस्टिस बहारुल इस्लाम आदि शामिल हैं।

इन विवादों के बीच चीफ जस्टिस ने कहा, अगर कोई जज किसी राजनीतिक पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ता है तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है।

क्योंकि कई लोग इसे हितों के टकराव या जज के पद पर रहते हुए सरकार से अनैतिक लाभ प्राप्त करने का जरिया मानते हैं। उन्होंने साफ कहा, अगर जज गलत समय पर सरकारी पद लेते हैं तो इससे न्यायपालिका पर जनता का भरोसा डगमगा सकता है।

क्योंकि इससे लोगों को लगेगा कि जज के फैसले भविष्य की संभावनाओं से प्रभावित हैं। चीफ जस्टिस ने कहा कि उनके कई साथियों ने रिटायरमेंट के बाद कोई सरकारी पद न लेने की शपथ ली है। यह न्यायपालिका पर लोगों के भरोसे को बचाने की कोशिश है।

चीफ जस्टिस ने जजों के सरकारी पद लेने या राजनीति में शामिल होने पर जिस तरह से सार्वजनिक तौर पर आपत्ति जताई, वह काफी महत्वपूर्ण है। सवाल यह उठता है कि क्या मुख्य न्यायाधीश ने सिर्फ रंजन गोगोई जैसे अपने पूर्ववर्तियों पर कटाक्ष किया या फिर उन्होंने भावी पीढ़ियों को भी ऐसे व्यवहार से बचने का संदेश दिया?