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जाने कहां गये वो दिन.. .. .. ..

जाने कहां गये वो दिन, जब कहा गया था कि हरेक के बैंक खाता में पंद्रह पंद्रह लाख रुपये आयेंगे। बाद में मोटा भाई ने कहा कि यह तो बस एक जुमला था। उसी वक्त से कंफ्यूजन इस बात का है कि एक ही देश में दो अलग अलग किस्म का विकास कैसे हो रहा है। एक वर्ग तो वह है जो कोरोना लॉकडाउन में अमीर से और अमीर हो रहा था और दूसरे हम जैसे लोग हैं जो जीएसटी भरते भरते गरीब होते जा रहे हैं।

काफी सोचने के बाद भी इसका असली वजह अब तक समझ में नहीं आया है। फिलहाल ऑपरेशन सिंदूर का मौसम चल रहा है और ज्यादा कुछ कहने सुनने की गुंजाइश नहीं है। फिर भी राष्ट्रप्रेम से ओत प्रोत समाज में युवाओं के लिए नौकरी का वादा आखिर कहां गायब हो गया है।

खैर इसके बीच भी संतोष इस बात का है कि पहली बार पाकिस्तान को अपने पड़ोसी को बार बार परमाणु बम की धमकी देने का असली नुकसान समझ में आ गया है। उनकी हालत वैसे बच्चे की है जो जोरदार ढंग से पिटने के बाद भी फुक्का फाड़कर रो नहीं पाता है। अब भला हो अपने ट्रंप भइया का, जिन्होंने बार बार अपनी पहल से युद्धविराम कराने की रट लगा रखी है।

दूसरी तरफ ऑपरेशन सिंदूर के बाद अब चुनावी मौसम में सिंदूर बांटने के प्रोग्राम को ममता बनर्जी ने यह कहकर डिस्टर्ब कर दिया है कि दूसरों को सिंदूर कैसे बांटोगे, पहले जाकर अपनी पत्नी को सिंदूर लगाओ। जाहिर है कि इस बात से परेशानी तो होनी ही थी। बेचारे संबित पात्रा को मैदान में उतरकर ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा संभालना पड़ा।

वैसे एक बात तो है कि ऑपरेशन सिंदूर ने चंद दिनों के लिए ही सही, असली मुद्दों को फिर से ठंडे बस्ते में डालने का इंतजाम कर दिया है। वरना रोटी, रोजगार और राजनीति तीनों मोर्चों पर सरकार परेशान हाल चल रही थी। चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद भी आम आदमी के हिस्से में कितना विकास आया है, यह सवाल दिनों दिन बड़ा होता जा रहा है।

इसी बात पर फिल्म मेरा नाम जोकर का यह गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी ने और संगीत में ढाला था शंकर जयकिशन ने। इसे मुकेश कुमार ने अपना स्वर प्रदान किया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में

नज़रों को हम बिछाएंगे

चाहे कहीं भी तुम रहो, चाहेंगे तुमको उम्र भर

तुमको ना भूल पाएंगे

जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में

नज़रों को हम बिछाएंगे

मेरे कदम जहाँ पड़े, सजदे किये थे यार ने

मेरे कदम जहाँ पड़े, सजदे किये थे यार ने

मुझको रुला रुला दिया, जाती हुई बहार ने

जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में

नज़रों को हम बिछाएंगे

अपनी नज़र में आज कल, दिन भी अंधेरी रात है

अपनी नज़र में आज कल, दिन भी अंधेरी रात है

साया ही अपने साथ था, साया ही अपने साथ है

जाने कहाँ गए वो दिन …

इस दिल के आशियान में बस उनके ख़याल रह गये

तोड़ के दिल वो चल दिये, हम फिर अकेले रह गये

जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में

नज़रों को हम बिछाएंगे

अब बिहार भी हो आते हैं, सर्वदलीय बैठक छोड़कर अपने मोदी जी यहां की जनसभा में उन बातों का जिक्र कर गये, जिन्हें संसद के अंदर बोला जाना चाहिए था। बस बोलने में जोश जोश में एक गलती हो गयी कि भाई साहब यह कह गये कि उनकी रगो में गर्म सिंदूर बहता है। भाई लोग मौके की ताक में बैठे हुए थे और एक छोटी सी बात को ले उड़े। सीमा पर शांति होने के साथ साथ देश के दूसरे मुद्दे फिर से सर उठाने लगे हैं।

झारखंड की बात करें तो वित्त आयोग से हेमंत सरकार ने अपना बकाया मांगा है। इससे पहले हेमंत सोरेन पीएम से मिलते वक्त कोयला संबंधित बकाया और राज्य का जायज हिस्सा मांगकर आये हैं। कुल मिलाकर हर गैर भाजपा शासित राज्य इस बात की शिकायत कर रहे हैं कि मोदी सरकार उन्हें उनके हिस्से से कम पैसा दे रही है।

अब सभी के दावों के बीच असली सच कौन बोल रहा है, इसका पता तो बाद में ही चल पायेगा। चलते चलते झारखंड की शराब नीति को भी समझ लें। बेचारे विनय चौबे गिरफ्तार हो गये जबकि इससे मुख्य सचिव पद की दौड़ में वह जाहिर तौर पर पिछड़ गये हैं। सब कुछ आम आदमी को पता था तो बड़े हाकिम कैसे इसे नहीं समझ पाये, यह भी गंभीर सवाल है।