रिम्स के सेंट्रल लैंब की निविदा को रोकने में कौन कौन सक्रिय
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किसकी है काले रंग की फॉरचुनर गाड़ी
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कहां आती जाती है, यह लोग जानते हैं
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जांच के सवाल ही पक्षपातपूर्ण साबित हुए
रजत कुमार गुप्ता
रांचीः किसी आजाद शेखर नामक व्यक्ति की शिकायत पर जो जांच आनन फानन में प्रारंभ की गयी, उसका असली मकसद क्या था, यह तो निविदा समिति के सदस्यों से हुई पूछताछ से ही स्पष्ट हो जाता है। जांच कमेटी ने यह जानना चाहा कि आखिर इस निविदा के लिए मात्र दो लाख रुपये की सुरक्षित राशि की मांग क्यों की गयी और इससे निविदादाताओं को लाभ मिले।
इसके जांच कमेटी को बताया गया कि एम्स के परचेज मैन्युअल के मुताबिक ही काम किया गया है और यह भी बताया गया है कि यह मासिक आधार पर जारी होने वाले बिलों के भुगतान पर आधारित है। एक सामान्य गणना के मुताबिक अनुमानित पांच करोड़ की वार्षिक खपत के आधार पर पांच लाख रुपये की अर्नेस्ट मनी का नियम लगाया गया था, जिसे तीनों सफल निविदादाताओं द्वारा जमा किया गया है।
कुल परेशानी का असली मुद्दा इस जांच रिपोर्ट के क्रम संख्या चार में दिख जाता है। इसमें जांच अधिकारी ने सवाल किया है कि रिम्स के निदेशक अथवा अधीक्षक डेढ़ करोड़ रुपये तक का ही रेट कांट्रेक्ट जारी कर सकते हैं। इसके ऊपर की राशि होने पर इसके लिए रिम्स के शासी निकाय के अध्यक्ष की स्वीकृति चाहिए। इसके उत्तर में जांच अधिकारियों को बताया गया है कि शासी निकाय द्वारा इसकी सैद्धांतिक मंजूरी दी गयी थी और इसका उल्लेख रिम्स की जीबी की 55-12-17 में किया गया है। इसी मंजूरी के आधार पर निविदा के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया गया।
जांच में यह मुद्दा भी उठा कि मूल कंपनी के सबकॉंट्रेक्टर को काम कैसे सौंपा जा सकता है जबकि उसके उत्तर में यह बताया गया कि जांच के काम आने वाली रिजेंट की आपूर्ति ही मूल कंपनी के वितरक द्वारा किये जाने की स्वीकृति प्रारंभ में ही दी गयी थी। इसकी दूसरी वजह महंगी मशीनों के रखरखाव की भी थी, जिन्हें कंपनी के वितरक द्वारा ही किया जाना है, जो एक प्रचलित पद्धति है।
इस बारे में निविदा में भाग लेने वाली एक कंपनी सीमेंस हेल्थकेयर द्वारा लिखित अनुरोध भी किया गया था। जिसे चर्चा के उपरांत स्वीकारा गया। जांच टीम ने यह सवाल उठाया है कि निविदा संख्या 2536 के संदर्भ में रिम्स से स्पष्टीकरण मांगा गया था। अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल किये बिना ही निविदा को जारी कर दिया गया।
इससे प्रतीत होता है कि मंत्री से छिपाने के मकसद से ऐसा किया गया है। जांच में निविदा के हर पन्ने पर निविदाताता का हस्ताक्षर होने की बात कही गयी है जबकि यह बताया गया है कि दरअसल यह एक ऑनलाइन टेंडर है। तकनीकी मूल्याकं के लिए रोश डॉयगनोस्टिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा सभी दस्तावेजों पर हस्ताक्षरित औऱ मुहर लगाकर जमा किया गया है।
इस जांच संबंधी दस्तावेज से साफ हो जाता है कि दरअसल जांच समिति को हर स्तर पर इस निविदा को अमान्य करने का निर्देश पहले से प्राप्त था। इसी वजह से वास्तविक परिस्थितियों और दस्तावेजों का गहन अध्ययन किये बिना ही टेंडर को रद्द करने की पुरजोर कोशिश की गयी है।
मामले की छानबीन में लखनऊ नंबर के एक काले फॉरचुनर गाड़ी को आते जाते लोग देख रहे हैं। जानकार बताते हैं कि यह सारा खेल दरअसल रांची के जालान बंधुओं का है, जो चंद लोगों के साथ मिलकर अपनी कमाई का रास्ता बंद करना नहीं चाहते। वैसे इस प्रक्रिया में रिम्स के एक अन्य अधिकारी के यहां हर शाम इसी गाड़ी के आने और मीटिंग होने की जानकारी से भी लोग नावाकिफ नहीं है। समाप्त