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मनमानी गिरफ्तारी उचित नहीं हैः सुप्रीम कोर्ट

देश के तमाम कर अधिकारियों को अदालत ने चेतावनी दी

  • उनके पास पुलिस के अधिकार नहीं

  • गिरफ्तारी की ठोस वजह होनी चाहिए

  • अगली सुनवाई 17 मार्च को तय की गयी

नईदिल्लीः उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को फैसला सुनाया कि कर अधिकारियों द्वारा मनमानी गिरफ्तारी और जबरदस्ती संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, और निर्देश दिया कि अधिकारियों की प्रवर्तन कार्रवाई कानून की सीमा के भीतर रहनी चाहिए।

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) अधिनियम और सीमा शुल्क अधिनियम के अंतर्गत गिरफ्तारी की शक्तियों को स्पष्ट करते हुए और एक ऐतिहासिक फैसले में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि इन कर कानूनों के अंतर्गत अधिकारी पुलिस अधिकारियों का दर्जा नहीं रखते हैं और इस तर्क को खारिज कर दिया कि उन्हें ऐसा माना जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अंतर्गत प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय इन कानूनों के अंतर्गत की गई गिरफ्तारियों पर समान रूप से लागू होंगे। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसमें अग्रिम जमानत प्रावधान लागू होते हैं, जो लोगों को एफआईआर दर्ज होने से पहले ही न्यायपालिका से राहत मांगने की अनुमति प्रदान करते हैं।

पीठ ने कहा कि जीएसटी और सीमा शुल्क कानूनों के अंतर्गत गिरफ्तारी सत्यापित सामग्री पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल संदेह के आधार पर। उसने कहा कि इन कानूनों के अंतर्गत अधिकारी पुलिस अधिकारी नहीं होते हैं और समान शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। गिरफ्तारी पर जीएसटी विभाग द्वारा जारी किए गए परिपत्रों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।

अदालत ने निर्देश दिया कि कर भुगतान में दबाव के आरोपों को गंभीरता से लेना चाहिए; प्रभावित व्यक्ति न्याय के लिए अदालत जा सकते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी प्रावधानों में अस्पष्टता के कारण नागरिकों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। और इस बात पर बल दिया कि जीएसटी अधिनियम के अंतर्गत कोई निजी शिकायत नहीं हो सकती।

शीर्ष अदालत ने अरविंद  केजरीवाल मामले से इस सिद्धांत को लागू किया, जहां धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के अंतर्गत गिरफ्तारी के लिए विश्वास करने का कारण होना आवश्यक है। उसने यह निर्णय दिया कि जीएसटी और सीमा शुल्क की गिरफ्तारी पर भी यही सिद्धांत लागू होता है क्योंकि संबंधित कानूनी प्रावधान लगभग समान हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए कहा, हमने माना है कि दीपल महाजन का मामला अलग था और हमने अरंिवद केजरीवाल मामले का हवाला दिया है।सीमा शुल्क अधिनियम की धारा 132 और 104, जब अपराधों को संज्ञेय और जमानती के रूप में निर्दिष्ट करती है, तो इसके बजाय इसे गैर-संज्ञेय और गैर-जमानती माना जाना चाहिए।

हमने देखा है कि कर भुगतान में जबरदस्ती के आरोपों में कुछ दम है और ऐसी प्रथाओं की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने अपने सहमति वाले फैसले में, अनुच्छेद 226 के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा की शक्तियों को संबोधित किया, कर-संबंधी गिरफ्तारियों में संवैधानिक सुरक्षा उपायों को बनाए रखने पर अदालत के रुख की पुष्टि की।

यह निर्णय जीएसटी और सीमा शुल्क अधिनियमों के दंडात्मक प्रावधानों को चुनौती देने वाली 279 याचिकाओं के जवाब में दिया गया। अदालत का फैसला आरोपी व्यक्तियों के लिए कानूनी सुरक्षा को बहुत मजबूत करता है। शीर्ष अदालत ने इस बात पर बल दिया कि कर अधिकारियों द्वारा मनमानी गिरफ्तारी और जबरदस्ती संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, यह सुनिश्चित किया कि प्रवर्तन  कार्रवाई कानून की सीमा के अंदर होनी चाहिए। आगे की कार्यवाही के लिए मामले को  17 मार्च के लिए सूचीबद्ध किया गया है।