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नियुक्ति प्रक्रिया में स्वतंत्रता का दिखावा क्योः सुप्रीम कोर्ट

शीर्ष अदालत में फिर उलझा चुनाव आयुक्तों का मामला

  • कौन मंत्री पीएम का विरोध करेगा

  • ऐसे में फैसला पारदर्शी नहीं होगा

  • मुख्य न्यायाधीश क्यों इससे बाहर

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति में एक कैबिनेट मंत्री को शामिल करने पर सवाल उठाया। न्यायालय ने टिप्पणी की कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई भी मंत्री प्रधानमंत्री के स्टैंड के विरुद्ध जाने में सक्षम नहीं होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने पैनल की संरचना पर चिंता व्यक्त की। वर्तमान में इस पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। खंडपीठ ने कहा कि इस प्रकार की नियुक्तियों में निर्णय प्रभावी रूप से 2:1 के बहुमत से पारित होंगे, क्योंकि कैबिनेट मंत्री द्वारा प्रधानमंत्री की राय से अलग राय रखने की संभावना न के बराबर है।

चयन समिति की वर्तमान संरचना पर सवाल उठाते हुए अदालत ने तीखी टिप्पणी की, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में स्वतंत्रता का यह दिखावा क्यों? न्यायालय ने आगे कहा कि यदि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो  के निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हो सकते हैं, तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र प्रक्रिया का पालन न किया जाए।

खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया कहीं अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे तौर पर लोकतंत्र की रक्षा और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव से जुड़ी है। अदालत ने चुनाव निकाय की निष्पक्षता में जनता के विश्वास के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत के चुनाव आयोग को न केवल तटस्थ होना चाहिए, बल्कि उसके कामकाज में तटस्थता दिखनी भी चाहिए।

खंडपीठ ने आगे तर्क दिया, कैबिनेट का कोई मंत्री क्यों होना चाहिए? मान लीजिए सत्ताधारी दल के 300 सांसद हैं। प्रधानमंत्री अपने सर्वश्रेष्ठ 25 को चुनते हैं। अब आप फिर से सूक्ष्म प्रबंधन करते हैं और उन 25 में से एक को ले आते हैं। क्यों? फिर आप विपक्ष के नेता को क्यों शामिल करते हैं? वह केवल औपचारिक हैं। निर्णय हमेशा 2:1 ही रहेगा। क्या कैबिनेट का कोई सदस्य प्रधानमंत्री के खिलाफ जाएगा?

याचिकाकर्ता लोक प्रहरी की ओर से पेश हुए सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एस.एन. शुक्ला ने न केवल चयन प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले कानून को चुनौती दी, बल्कि वर्तमान नियुक्तियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि यदि संविधान में किसी ऐसे व्यक्ति को रोकने का प्रावधान नहीं है जो कार्यपालिका के प्रभाव में हो सकता है, तो चुनाव आयुक्त के कार्यकाल को सुरक्षित बनाने का कोई लाभ नहीं है।