Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
पुलिस से भाग रहे गांजा तस्करों की कार पलटी, अंधेरे में कुएं में गिरने से दर्दनाक मौत MP Board Result: एमपी बोर्ड परीक्षा में फेल होने पर छात्रा ने की आत्महत्या, रिजल्ट देखने के बाद उठाय... Morena News: MP बोर्ड 12वीं में फेल होने पर छात्र ने खुद को मारी गोली, कोतवाल डैम पर की खुदकुशी Indian Politics: तीन दिन, 28 घंटे की चर्चा और सत्ता का नया समीकरण; क्या सच में बदल जाएगा भारतीय लोकत... IPL 2026: 'सब तितर-बितर कर दूंगा...', KKR की टीम और प्लेइंग-11 को लेकर वीरेंद्र सहवाग ने दिया बड़ा ब... Naagzilla Postponed: सनी देओल से क्लैश के कारण बदली कार्तिक आर्यन की 'नागजिला' की रिलीज डेट, जानें अ... US vs Iran: होर्मुज जलडमरूमध्य ब्लॉक करने का दांव फेल, जानें समंदर में अमेरिका के खिलाफ ईरान ने कैसे... Dubai Property Market: मिडिल ईस्ट टेंशन का दुबई रियल एस्टेट पर बड़ा असर, औंधे मुंह गिरे प्रॉपर्टी के... Health Alert: क्या आप भी AI से पूछते हैं बीमारी का इलाज? नई स्टडी का खुलासा- 50% मामलों में मिली गलत... Vaishakh Masik Shivratri 2026: आज है वैशाख मास की शिवरात्रि, जानें पूजा का सटीक मुहूर्त और विशेष संय...

महाकुंभ का राजनीतिक प्रभाव

नदी का पानी, जहां लाखों लोग पुण्य प्राप्ति की आशा में स्नान करते हैं, रोगाणुओं से दूषित है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने प्रयागराज में गंगा और यमुना के संगम से नमूनों की जांच के बाद राष्ट्रीय पर्यावरण न्यायालय को बताया है कि यह पानी मानव स्नान के लिए उपयुक्त नहीं है।

ई कोली और साल्मोनेला सहित विभिन्न प्रकार के आंत्र रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं की उपस्थिति सुरक्षित स्तर से कई गुना अधिक है। जैसा कि 2019 में कुंभ मेले के बाद भी देखा गया था। जैसे ही हंगामा शुरू हुआ, योगी आदित्यनाथ सरकार के अधिकारियों ने प्रचार करना शुरू कर दिया, जिसमें दिखाया गया कि उन्होंने कितने लाख अस्थायी शौचालय बनवाए हैं, कितने हजार टन ब्लीचिंग पाउडर, फिनाइल और नेफ़थलीन वितरित किए हैं और मानव अपशिष्ट के प्रसंस्करण के लिए उन्होंने कितनी आधुनिक प्रणालियाँ स्थापित की हैं।

एक संगीतकार ने इसके बीच ही योगी आदित्यनाथ से इस पानी को पीने की चुनौती दे डाली। जिस पर भाजपा वाले चुप्पी साध गये। यह ठीक वैसा ही था जब दिल्ली में यमुना के जल में प्रदूषण होने के मसले पर अरविंद केजरीवाल ने किया था। किसी ने भी पानी को पीने का साहस नहीं किया था।

लेकिन समस्या मूल में है, और यह सरकार की समस्या है – प्रतिदिन भारी मात्रा में अनुपचारित अपशिष्ट गंगा और यमुना में डाला जा रहा है। पिछले नवंबर में राष्ट्रीय पर्यावरण न्यायालय ने कहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, उस राज्य में उत्पन्न अपशिष्ट और उपचारित अपशिष्ट के बीच 120 मिलियन लीटर से अधिक का अंतर है।

यानी इतनी मात्रा में अनुपचारित मानव अपशिष्ट प्रतिदिन गंगा में जा रहा है। नवंबर में प्रयाग में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की उपस्थिति सुरक्षित स्तर से ऊपर थी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, लगभग 250 नाले अनियंत्रित तरीके से गंगा और उसकी सहायक नदियों में अपशिष्ट गिरा रहे हैं।

महाकुंभ जैसे विशाल आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने क्या तैयारियां की थीं? राष्ट्रीय पर्यावरण न्यायालय को सूचित किया गया है कि किसी भी राज्य या केंद्रीय एजेंसी की वेबसाइट पर अपशिष्ट उपचार और जल गुणवत्ता के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

क्या तीर्थयात्रियों को यह जानने का अधिकार नहीं है कि वे जिस जल में स्नान कर रहे हैं उसकी गुणवत्ता क्या है? अब दूसरा अंकगणित यह कहता है कि एक तिहाई से अधिक भारतीय आबादी

ने यहां स्नान किया है जो सामान्य तौर पर अपने आस पास नजर दौड़ाने से असंभव दिखता है।

हम जिन्हें जानते हैं, उनमें से हर तीसरा व्यक्ति का क्या कुंभ गया था, यह सवाल का उत्तर देता है।

अगला सवाल यह है कि किसी चमत्कारिक लाभ की आशा में या सामूहिक पागलपन में उस शक्ति को खोना अत्यंत मूर्खतापूर्ण है। भारत में कोविड जैसी महामारी आई है, जहां सभी ने कीटाणुओं की घातक शक्ति को देखा है।

क्या पवित्र स्नान दूसरों की बीमारी और मृत्यु के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार होने के ‘पाप’ को धो सकता है?

यह सच है कि किसी धार्मिक स्थल की पवित्रता की अवधारणा, उसकी महानता की भावना, पर्यावरण विज्ञान या शहरी भूगोल से नहीं आती, बल्कि धार्मिक शास्त्रों, पौराणिक कथाओं और महाकाव्यों से पैदा हुई कल्पना से आती है।

उस काल्पनिक दुनिया में गंगा सदैव शिव की जटाओं से निकलने वाली एक पाप-शोषक धारा है। प्रति मिलीलीटर पानी में कितने ई कोली बैक्टीरिया हैं, इसकी गणना इस दुनिया की गंगा को प्रदूषित नहीं कर सकती।

इससे प्रशासन और राजनीतिक दलों को काफी लाभ होता है। नमामि गंगे परियोजना पर 40,000 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन इस बात का कोई जवाब नहीं है कि गंगा के दोनों किनारों पर अपशिष्ट प्रसंस्करण प्रणाली क्यों पूरी नहीं हो पाई है।

अब महाकुंभ के असली मुद्दे पर आते हैं, वह है योगी आदित्यनाथ को देश में एक मजबूत नेता के तौर पर स्थापित करने की चाल। वहां योगी समर्थकों ने शंकराचार्य को भी सोशल मीडिया में अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

यह नाराजगी उनके एक बयान से थी। तो क्या योगी आदित्यनाथ खुद को ऐसे आयोजनों के जरिए धार्मिक स्तर के अलावा भाजपा की राजनीति में भी ऊपर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।

इस सीधे सवाल का उत्तर हां ही है। आम तौर पर यह माना जाता है कि दिल्ली में नरेंद्र मोदी के  बाद अमित शाह का नंबर आता है। नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह जैसे नेता अब किनारे लगाये जा रहे हैं।

ऐसे में योगी बार बार अपने राजनीतिक फैसलों से अमित शाह को अपने मुकाबले कमजोर साबित करते आये हैं। अब महाकुभ भी इसी शक्ति प्रदर्शन का एक हिस्सा भर है। जिसका असर बाद में देखने को मिलेगा।