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बलि का बकरा तलाशने का खेल

विधानसभा चुनाव की हार से उबर नहीं पा रही भाजपा

  • प्रदेश के नेताओं की नहीं सुनी गयी

  • चौहान और हिमंता का हुक्म चला

  • अनुभव का लाभ नहीं उठाया गया

राष्ट्रीय खबर

 

रांचीः झारखंड विधानसभा के चुनाव में पार्टी की अप्रत्याशित पराजय से भाजपा को सदमा लगा है। स्पष्ट तौर पर पार्टी अब तक इस सदमे से उबर नहीं पायी है। इसकी खास वजह कई दिग्गजों और उनके परिवार के लोगों का इस चुनाव में हार जाना ही है। लिहाजा राजनीतिक कार्यक्रमों में सुस्ती है जो अब शायद नये साल का जश्न समाप्त होने तक जारी ही रहेगी।

विधानसभा के संक्षिप्त सत्र में भी भाजपा का यह हाल सदन के अंदर और बाहर नजर आया है। पार्टी के पराजय के साथ साथ पार्टी को कई अवसरों पर मजबूत आधार प्रदान करने वाले आजसू प्रमुख सुदेश महतो का हार जाना भी पार्टी के एक बड़े धड़े के लिए बड़ा धक्का है। वैसे इस बात को पार्टी के लोग भी जानते हैं कि सुदेश की हार से भाजपा का कौन सा गुट अंदर से काफी प्रसन्न है और आगे की रणनीति बना रहा है।

घटनाक्रम कुछ ऐसे दिख रहे हैं कि अब इस शर्मनाक हार के लिए किसी के माथे पर ठिकरा फोड़ने की अंदर ही अंदर तैयारी चल रही है। स्थापित परंपरा के मुताबिक सबसे पहले इसके शिकार बाबूलाल मरांडी ही होंगे, जो भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं। लेकिन सवाल यह होगा कि क्या श्री मरांडी की अकेले की यह जिम्मेदारी है।

इस सवाल के उत्तर में भाजपा के ही जमीनी स्तर के लोगों की दलील दूसरी है। उनलोगों का तर्क है कि जब पूरी चुनाव ही हाईजैक हो गया था तो इसके लिए श्री मरांडी को ही जिम्मेदार ठहराना कैसे जायज है। दरअसल ऐसे लोगों की दलील के निशाने पर खास तौर पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान है।

ग्रासरूट स्तर पर यह बात बार बार दोहरायी गयी है कि जो वोट बैंक भाजपा से छिटक गया था, उसे करीब लाने की कोई दलील इस चुनाव में नहीं सुनी गयी। इसका नतीजा चुनाव परिणामों से झलकता है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि केंद्र द्वारा नामित दोनों बड़े नेताओं ने प्रदेश समिति के नेताओं से बात कर फैसला लेने की पहल तक नहीं की।

इससे अलग प्रदेश संगठन मंत्री की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिन्होंने भी अपने स्तर पर पार्टी को कई गुटों में बांट देने की गलती थी और उसका नतीजा पूरे चुनाव में भाजपा को बार बार भुगतना पड़ा। इससे अलग एक विचार और है और वह यह है कि पूरी प्रक्रिया से अर्जुन मुंडा को अलग रखा जाना भी पार्टी की बहुत बड़ी गलती रही।

अर्जुन मुंडा को भाजपा में ऐसा नेता माना जाता है जो चुनावी राजनीति के धाकड़ खिलाड़ी है पर शायद अमित शाह से नहीं पटने की वजह से वह लगातार किनारे ही रहे। इस बीच नया सवाल यह खड़ा हो रहा है कि जिस तरीके से जमशेदपुर के चुनाव में उड़ीसा के राज्यपाल रघुवर दास ने सक्रिय भूमिका निभायी तो क्या अब भाजपा नेतृत्व फिर से रघुवर दास को प्रदेश की राजनीति में वापस लाना चाहेगा।