यहां मारे या खुद मरो जैसी हालत में हथियारबंद हैं
एजेंसियां
मोगादिशुः आज के 34 वर्षीय दुकानदार यूसुफ अली सोमालिया की राजधानी मोगादिशु की सड़कों पर लड़े गए उस युद्ध की यादों से जूझ रहे हैं, जिसने उन्हें 16 साल की उम्र में एक बाल सैनिक बना दिया था। सोमालिया में लगभग 20 साल पहले शुरू हुए इस्लामी विद्रोह के दौरान अली जैसे कई युवा अनजाने में हिंसा की भेंट चढ़ गए।
14 साल की उम्र में, जब अली स्कूल में थे, तब सोमालिया में यूनियन ऑफ इस्लामिक कोर्ट्स ने सत्ता संभाली। 2006 में, इथियोपियाई सैनिकों ने अमेरिकी ड्रोनों की मदद से इस सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए आक्रमण किया। यह आक्रमण सोमालियाई लोगों के लिए एक गहरा घाव बन गया। अली बताते हैं कि उस दौरान उन्होंने अपने पड़ोस में बमबारी और तबाही का नंगा नाच देखा। एक रात पड़ोसी के घर पर गिरे शेल के बाद उन्होंने मलबे के नीचे दबी एक युवा लड़की की लाश देखी, जिसने उनके मन को झकझोर कर रख दिया।
धार्मिक कट्टरता और गालो (काफिरों) के खिलाफ मस्जिदों से मिले भड़काऊ उपदेशों ने अली जैसे किशोरों को मुकावामा (प्रतिरोध) समूह में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। अली को छोटे हथियारों का प्रशिक्षण दिया गया और वह मोगादिशु की गलियों में शहरी युद्ध का हिस्सा बन गए। वह याद करते हैं, हम स्ट्रीट-दर-स्ट्रीट लड़ते थे। कभी-कभी मैं देखता कि मारा गया सैनिक मेरी ही उम्र का है, लेकिन युद्ध की तीव्रता ऐसी थी कि रुकने का मतलब अपनी मौत को दावत देना था। यह मारो या मरो की स्थिति थी।
2009 में, अपने परिवार के दबाव में अली दक्षिण अफ्रीका चले गए, जहाँ उन्होंने पांच साल बिताए। लेकिन वहाँ के विदेशी-विरोधी हमलों के कारण उन्हें वापस मोगादिशु लौटना पड़ा। आज मोगादिशु एक पुनर्निर्मित शहर है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और अल-शबाब का खतरा अभी भी बना हुआ है। अली आज इस बात को लेकर गहरे अपराधबोध में हैं कि जिस आजादी के लिए उन्होंने लड़ाई लड़ी, उसने अंततः उनके देश और उनके लोगों को केवल तबाही और अविश्वास के दौर में ही धकेला है।