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शहरों का विकास या बाढ़ से विनाश


तकनीकी तौर पर उन्नत महानगर यानी बेंगलुरु एक बार फिर से बाढ़ की चपेट में आ गया। ऐसे अनेक तस्वीरें दिखी, जिसमें कीमती कारें भी पानी में डूबी हुई नजर आ रही है। इस लिहाज से यह सवाल प्रासंगिक है कि विकास की जो अवधारणा हमारी सोच में डाला गया है क्या वह सही है।

बहुमंजिली इमारतों के जाल से शहर ऊंचाई में जिस तेजी से फैल रहा है, उसे बदलकर अब क्षेत्रफल में बढ़ाने पर विचार करने का समय आ गया है। दरअसल शहरी बाढ़ एक मानव निर्मित आपदा है जो कई कारकों के कारण होती है, जिसमें खराब नागरिक बुनियादी ढाँचा, अपर्याप्त नियमन और अनियंत्रित शहरी विस्तार शामिल हैं।

यह सुझाव देता है कि भविष्य की त्रासदियों को रोकने के लिए, शहरों को बाढ़-रोधी डिज़ाइनों को प्राथमिकता देनी चाहिए, नियमों को लागू करना चाहिए और सुरक्षा की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए। भारत में शहरी बाढ़ के कारण होने वाले महत्वपूर्ण आर्थिक, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे के नुकसान पर ध्यान देना होगा।

प्रभावी उपायों में स्पंज सिटी अवधारणाओं को अपनाना, स्मार्ट स्टॉर्मवॉटर सिस्टम को एकीकृत करना, शहरी आर्द्रभूमि को पुनर्जीवित करना और बाढ़-रोधी वास्तुकला को लागू करना शामिल है। हाल के वर्षों में दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में होने वाली लगातार बाढ़ पर चर्चा करें।

इसमें सुझाव दिया गया है कि शहरों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने के लिए क्षमता का निर्माण करना होगा, और इसके लिए सरकारों और नागरिकों दोनों की ओर से दोहरा दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होगी।

पिछले 15 सालों से भी ज़्यादा समय से भारतीय शहर मानसून की परीक्षा में विफल हो रहे हैं। इस साल, दिल्ली के कई हिस्से एक से ज़्यादा दिनों तक जलमग्न रहे, गुवाहाटी में बाढ़ ने भयंकर तबाही मचाई और पिछले हफ़्ते, पुणे और मुंबई समेत महाराष्ट्र के कई इलाकों में मूसलाधार बारिश ने लोगों की ज़िंदगी को रोक दिया।

इन सभी शहरों की भौगोलिक विशेषताएँ अलग-अलग हैं। हालाँकि, बाढ़ से जुड़ी उनकी परेशानियों में कम से कम तीन चीज़ें एक जैसी हैं: पुरानी जल निकासी व्यवस्थाएँ जो सामान्य से ज़्यादा बारिश का दबाव नहीं झेल सकतीं, ऐसी योजनाएँ जिनमें स्थानीय जल विज्ञान और नागरिक एजेंसियों को ध्यान में नहीं रखा जाता जिनकी भूमिका सिर्फ़ राहत और बचाव के आयोजन तक सीमित लगती है। ज़्यादातर मौतें नालों के


उफनने, दीवार या इमारत के गिरने और बिजली के झटके लगने की वजह से होती हैं।

उदाहरण के लिए, पुणे में शहर के जलमग्न हिस्से में बिजली का झटका लगने से तीन लोगों की जान चली गई। 22 जुलाई को, राष्ट्रीय राजधानी में एक जलमग्न सड़क पर 26 वर्षीय सिविल सेवा अभ्यर्थी की बिजली गिरने से मौत हो गई – राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली के मुख्य सचिव, पुलिस आयुक्त और शहर की बिजली वितरण कंपनी के प्रमुख से घटना पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।

यह अब सर्वविदित है कि जलवायु परिवर्तन ने चरम मौसम की घटनाओं की तीव्रता को बढ़ा दिया है। पिछले सप्ताह गुरुवार और शुक्रवार को पुणे और मुंबई में लगभग 45 प्रतिशत अधिक वर्षा हुई। महाराष्ट्र की राजधानी में जलवायु कार्य योजना है और राज्य के दूसरे सबसे बड़े शहर में भी इसी तरह की परियोजना चल रही है।

समस्या यह है कि भारतीय शहरों को जलवायु के प्रति लचीला बनाने के लिए संस्थागत तंत्र पर बहुत कम बातचीत हुई है। मुंबई की जलवायु कार्य योजना में उद्योग, शिक्षा और नागरिक समाज संगठनों को शामिल करते हुए एक सहयोगी तंत्र की आवश्यकता का उल्लेख है।

कुल मिलाकर आधुनिक विकास के नाम पर जो नये शब्द हमारे दिमाग में बैठाये गये हैं, उनके लाभ हानि पर विचार करना होगा। एलिवेटेड रोड, अंडर पास, फ्लाईओवर जैसे शब्द प्रारंभ में सुनने और देखने में जो अच्छे लगते हैं पर क्या बारिश के दिनों में ऐसे अंडरपासों पर होने वाले जलजमाव से ठहरे ट्राफिक जाम को हम समझ नहीं पा रहे हैं।

दूसरे शहरों की बात छोड़ दें तो आज से करीब बीस साल पहले बारिश होने पर पूरी रांची की हालत ऐसी दिखती थी कि शहर को अच्छी तरह पानी से धोकर साफ कर दिया गया है। लेकिन आज आधा घंटा बारिश हो तो कई इलाकों में पैदल चलना मुश्किल हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर आप अपने आस पास की हालत को देख सकते हैं। पानी निकासी के लिए अरबों की सिवरेज योजना क्या काम आ रही है, यह भी देखा जाना चाहिए। इसलिए अब विकास की पुरानी सोच को बदलकर कैसे शहरों का विकास हो, इस पर ध्यान देने की जरूरत है। वरना विकास की यही सोच अनेक शहरों को डूबा डूबाकर खत्म कर देगी। वैसे भी समुद्री तटों पर विकसित शहर अब जलवायु परिवर्तन की वजह से खतरों को झेल ही रहे हैं।