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जातिगत जनगणना पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

  • राज्य सरकार को नीतिगत निर्णय से नहीं रोक सकते

  • बिहार सरकार से शीर्ष अदालत ने जबाव मांगा है

  • गोपनीयता के तर्क को भी खारिज किया गया है

नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने जाति जनगणना करने और उसे प्रकाशित करने के बिहार सरकार के फैसले पर रोक लगाने या यथास्थिति बनाए रखने से इनकार करते हुए शुक्रवार को कहा कि वह राज्य सरकार या किसी भी सरकार को निर्णय लेने से नहीं रोक सकता।

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और एस वी एन भट्टी की पीठ ने स्वयंसेवी संस्थाओं- एक सोच एक प्रयास, यूथ फॉर इक्वलिटी और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि फिलहाल यथास्थिति का आदेश नहीं दिया जा सकता, क्योंकि राज्य सरकार को नीतिगत निर्णय लेने से रोकना गलत होगा। पीठ ने मौखिक रूप से कहा, हम राज्य सरकार या किसी भी सरकार को निर्णय लेने से नहीं रोक सकते।

पीठ ने हालांकि कहा, हम आंकड़े एकत्र करने के राज्य के अधिकार और अन्य सभी मुद्दों की जांच करने जा रहे हैं। शीर्ष अदालत ने जाति जनगणना कराने के राज्य सरकार के फैसले को बरकरार रखने के पटना उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया।

पीठ ने बिहार सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए कहा कि वह इस मामले में जनवरी 2024 विचार करेगी। इसके बाद याचिकाकर्ताओं को प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय भी दिया गया। पीठ ने संक्षिप्त सुनवाई के दौरान एक समय राज्य सरकार से पूछा कि उसने आंकड़े (जातिगत) क्यों प्रकाशित किया। इस पर बिहार सरकार के वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने कहा कि अदालत ने जनगणना प्रकाशन की तारीख के खिलाफ कभी कोई आदेश पारित नहीं किया। इस अदालत ने संकेत दिया था कि वह सबसे पहले यह तय करेगी कि नोटिस जारी किया जाए या नहीं।

वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह के नेतृत्व में याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि राज्य सरकार ने जातिगत जनगणना प्रकाशित की है। इसके खिलाफ पिछले आश्वासन के बावजूद इस अदालत को मामले की वैधता की जांच करने से एक तरह से रोक दिया है। इस पर पीठ ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से ऐसा कोई आश्वासन नहीं मिला है।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने यथास्थिति बनाए रखने और राज्य सरकार को जातिगत विवरण जुटाने की कार्रवाई करने से रोकने का निर्देश देने की गुहार लगाई। उन्होंने कहा कि जाति विवरण एकत्र करने का राज्य का निर्णय केएस पुट्टास्वामी मामले में शीर्ष अदालत के फैसले के विपरीत था। केएस पुट्टास्वामी मामले में शीर्ष अदालत ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी। पीठ ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को अस्वीकार कर दिया।

अदालत ने गोपनीयता के संबंध में तर्कों को भी खारिज कर दिया। पीठ ने याचिकाकर्ताओं से कहा, आम तौर पर सभी नीतियां आंकड़ों पर निर्भर और आधारित होती हैं। हम आपकी बात सुनेंगे। उच्च न्यायालय का फैसला काफी विस्तृत है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस बात पर विचार करेगी कि आम जनता को (जातिगत) आंकड़े का कितना हिस्सा उपलब्ध कराया जा सकता है, क्योंकि इसमें पारदर्शिता का सवाल शामिल है या क्या अदालत को इस मुद्दे की जांच करनी चाहिए।

पटना उच्च न्यायालय ने एक अगस्त को राज्य में जातिगत जनगणना कराने के बिहार सरकार के छह जून 2022 के फैसले को उचित ठहराया था। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि सरकार का यह अभ्यास पूरी तरह से वैध था। यह न्याय के साथ विकास प्रदान करने के वैध उद्देश्य के साथ उचित क्षमता के साथ शुरू किया गया था। गौरतलब है कि बिहार सरकार ने दो अक्टूबर 2023 को जातिगत जनगणना के आंकड़े का प्रकाशन किया था।