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इंडिया ने पिछली गलतियों से सबक सीखा है

पिछले सप्ताह मुंबई में इंडिया – द इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल, इनक्लूसिव एलायंस – के बैनर तले पार्टियों की तीसरी बैठक में आगामी लोकसभा चुनाव जहाँ तक संभव हो एक साथ लड़ने का संकल्प लिया गया। दो दर्जन से अधिक पार्टियों ने घोषणा की कि विभिन्न राज्यों में सीट-बंटवारे की व्यवस्था तुरंत शुरू की जाएगी और लेने और देने की सहयोगात्मक भावना के साथ जल्द से जल्द संपन्न की जाएगी।

प्रतिभागियों ने किसी संयोजक का चुनाव नहीं किया या लोगो का अनावरण नहीं किया बल्कि विभिन्न पहलुओं पर उनके बीच समन्वय में सुधार के लिए पांच समितियों की घोषणा की। 14 सदस्यीय समन्वय समिति चुनाव रणनीति समिति के रूप में काम करेगी, जबकि चार अन्य समितियां अभियान, सोशल मीडिया, मीडिया और अनुसंधान का समन्वय करेंगी।

इंडिया ब्लॉक अब एक विजन डॉक्यूमेंट लाने की योजना बना रहा है, जिसे गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को जारी किए जाने की संभावना है। देश के विभिन्न हिस्सों – पटना, नागपुर, दिल्ली, चेन्नई और गुवाहाटी में पांच रैलियों और नेताओं की एक नियमित बैठक की योजना बनाई जा रही है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी एकता प्रयासों के केंद्र के रूप में उभरे हैं क्योंकि उन्होंने अपनी पार्टी की स्थानीय गणनाओं की कीमत पर भी क्षेत्रीय दलों के वरिष्ठ नेताओं के साथ संबंध बनाए। कथित तौर पर श्री गांधी भारत जोड़ो यात्रा के दूसरे चरण की योजना बना रहे हैं, यह यात्रा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के गढ़ों के माध्यम से एक क्षैतिज मार्ग के साथ होगी। निश्चित तौर पर इस रणनीति ने भाजपा और उसकी समर्थक मीडिया को एक बड़ी परेशानी में डाल दिया है।

इस चाल के साथ साथ इन दोनों पर यह खतरा मंडरा रहा है कि अगर वाकई सरकार बदल गयी तो उनके भविष्य का क्या होगा। यही वजह है कि अब गाहे बगाहे इंडिया के नेताओं के कार्यक्रम की खबरें भी मेन स्ट्रीम मीडिया में दिखने लगी है। वरना एक ही आंकड़ों के जरिए अपना अपना समाचार परोसने वाले पहले ही साबित कर चुके हैं कि दरअसल उन्हें ऐसे कार्यक्रम चलाने के निर्देश किसी एक ही स्थान से आते हैं। पूर्व के अनुभवों से इंडिया गठबंधन में शामिल हुई पार्टियों को यह बात समझ में आ चुकी है कि वे अलग अलग चुनाव लड़कर नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को चुनौती नहीं दे सकते।

दूसरी तरफ भाजपा को भी यह बात समझ में आ चुकी है कि अगर यह सारे दल एकजुट होकर चुनाव में उतरे तो भाजपा के लिए जीत की राह आसान नहीं होगी। जातिगत गोलबंदी के बीच भाजपा का हिंदू मुसलमान कार्ड अब अपनी धार खो रहा है। इसलिए नये सिरे से तनाव पैदा करने की कोशिशें भी हो रही है।

इंडिया गठबंधन की बात करें तो यह स्पष्ट है कि ये पार्टियाँ भाजपा के खिलाफ आम जमीन तलाशती हैं, लेकिन केवल इससे भारत सत्तारूढ़ पार्टी का राष्ट्रीय विकल्प नहीं बन जाएगा। अधिकांश भारतीय पार्टियों के हित उनके संबंधित क्षेत्रों की स्थानीय विशिष्टताओं से परिभाषित होते हैं। पश्चिम बंगाल और केरल में इस सप्ताह होने वाले विधानसभा उपचुनाव शिक्षाप्रद हैं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से मुकाबला करने के लिए एक साथ हैं, जबकि केरल में कांग्रेस और लेफ्ट आमने-सामने हैं।

हो सकता है कि इन दोनों राज्यों में एक प्रत्याशी वाला फार्मूला अमल में नहीं लाया जाए। समाज के व्यापक हित में एक राष्ट्रीय योजना बनाने की इन पार्टियों की इच्छा कुछ लोगों को आकर्षक लग सकती है, लेकिन कुछ अन्य लोगों को यह पाखंड के रूप में दिखाई दे सकती है। ऑप्टिक्स के अलावा, पार्टियों के एक साथ आने से जरूरी नहीं कि उनके वोटों का एकत्रीकरण हो, जैसा कि गठबंधन राजनीति के कुछ प्रयोगों ने प्रदर्शित किया है।

कार्यक्रमों और नारों पर पार्टियों के बीच मतभेद कोई आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन असली चुनौती लोगों का विश्वास जीतने में है। भारत को मुद्दों को अच्छी तरह से तैयार करना होगा और व्यवहार्य उभरने के लिए प्रभावी ढंग से अभियान चलाना होगा। अपनी कथित वैचारिक दृढ़ता के बावजूद, भाजपा एक गतिशील और लचीली पार्टी है। यह राजनीतिक और प्रशासनिक कदमों के माध्यम से इंडिया की चुनौती का जवाब दे रहा है।

भाजपा का विरोध करना ही इंडिया की एकमात्र परिभाषित विशेषता नहीं हो सकती। लेकिन बिना किसी पूर्व सूचना के संसद का सत्र बुलाया जाना यह साबित करता है कि केंद्र सरकार मुंबई की बैठक के बाद पहली बार चुनावी हार की चिंता से ग्रस्त है। मजेदार स्थिति यह है कि मोदी के साथ साथ गोदी भी इस समीकरण को तोड़ने की जी तोड़ कोशिश में लगा है। यही वजह है कि बार बार इन दलों में मतभेद और पीएम का चेहरा कौन जैसे सवाल उठाये जा रहे हैं। दूसरी तरफ बार बार धोखा खाने के  बाद अब इंडिया गठबंधन वाले इस मेन स्ट्रीम मीडिया से दूरी बनाकर अपनी रणनीति को अंजाम दे रहे हैं। इसलिए लड़ाई रोचक हो चली है।