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दो हजार का नोट गायब, जिम्मेदारी किसकी

भारतीय अर्थव्यवस्था में दो हजार रुपये के नोट अधिक प्रचलन में नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि वे तिजोरियों में कैद हैं। अब भारत में चुनाव जिस तरीके से पैसे पर आधारित हो गया है, उससे एक संदेह तो यह बनता ही है कि इन दो हजार के नोटों का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक दलों और नेताओं के पास हैं।

बाकी नोट जाहिर तौर पर काला धन बन चुका है। इसलिए यह सवाल है कि आखिर इस काला धन को बड़ी करेंसी में तब्दील करने का मौका देने की जिम्मेदारी किसकी है। फिर से इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क और कुतर्क गढ़े जा रहे हैं, जिससे आम जनता का कोई लेना देना नहीं है।

जो जानकारी जनता के सामने हैं, वही सबसे महत्वपूर्ण है। भारतीय रिजर्व बैंक ने क्लीन नोट नीति के तहत 2000 रुपये के नोट को वापस लेने का फैसला किया है। 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कहा कि पुराने बड़े नोट (1000 रुपये और 500 रुपये) आधे हो गए हैं।

आरबीआई ने जनता की जरूरतों के लिए 10 नवंबर 2016 से 2000 रुपये का नोट पेश किया। लेकिन, आरबीआई ने हाल ही में खुलासा किया है कि उन्होंने 2018 में ही 2000 रुपए के नोटों की छपाई बंद कर दी है। हालांकि, मार्च 2017 तक 2000 रुपए के नोटों की 89 फीसदी छपाई का काम पूरा हो चुका है। सात साल पहले चलन में आया 2000 रुपए का नोट।

आरबीआई के मुताबिक, दो साल बाद इसकी छपाई बंद हो गई। उस समय से पांच साल से भी कम समय में, 2000 रुपये के नोट का उपयोग किया गया है। इस बीच, पिछले कुछ समय से बैंकों में 2000 रुपये के नोट चलन में नहीं हैं। केंद्र ने कहा कि 2016 में काले धन को दूर करने के मकसद से पुराने बड़े नोटों को वापस लिया गया और 2000 रुपए का नोट पेश किया गया।

इसलिए देश को नोटबंदी का एलान करने वाले नरेंद्र मोदी को इस बारे में सफाई देनी चाहिए कि आखिर उन्होंने एक हजार के बदले दो हजार का नोट किस सोच के तहत लागू किया था और अगर लागू किया था तो अब उसे वापस लेने की क्या जरूरत आ पड़ी है।

दरअसल नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व करिश्माई होने तथा वह खुद लोकप्रियता के शिखर पर होने के बाद भी यह कमजोरी बार बार उजागर होती रही है कि जनता से जुड़े टेढ़े सवालों को वह टाल जाते हैं। दूसरी खामी उनकी यह है कि वे अप्रिय प्रश्नों का सामना ही नहीं करना चाहते हैं।

यही वजह है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को कोसते हुए सत्ता शीर्ष की कुर्सी तक पहुंचने के बाद भी वह अब तक प्रेस से नहीं मिले हैं। उन्हें भी पता है कि हर किस्म के मीडिया मैनेजमेंट का हथकंडा अपनाने के बाद भी मुख्य धारा तथा वैकल्पिक मीडिया ने उनके लिए अनेक अप्रिय सवालों को जन्म दे दिया है।

चंद लोगों को मैनेज करने की उनकी चाल भी अब बेकार हो चुकी है। अब फिर से दो हजार के नोट पर वापस लौटें तो यह राय सामने आ चुकी है कि 2000 रुपये काले धन के रूप में छुपाने के काम आते हैं। आरबीआई द्वारा बताए गए विवरण के अनुसार, मार्च 2018 के अंत तक 2000 रुपये के नोटों का चलन घटकर 6.73 लाख करोड़ रुपये हो गया।

तब से, मार्च 2023 के अंत तक यह गिरकर 3.62 लाख करोड़ रुपये हो गया है। यानी अभी 10.8 फीसदी नोट ही चलन में हैं। शेष करीब नब्बे प्रतिशत दो हजार के नोट कहां गये, इसका उत्तर भी देना प्रधानमंत्री मोदी की जिम्मेदारी बनती है क्योंकि उन्होंने ही कालाधन खत्म करने का दावा ठोंका था जबकि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने संसद  में इस मुद्दे पर कहा था कि इस तरीके से देश में काला धन का अनियंत्रित साम्राज्य कायम हो जाएगा।

इस महीने की 23 तारीख से देश के सभी क्षेत्रीय आरबीआई कार्यालयों में 2000 रुपये के नोटों को स्थानांतरित करने की सुविधा के बावजूद व्यापार और वाणिज्यिक क्षेत्र में दैनिक वित्तीय लेनदेन के बाधित होने की आशंका है। 2000 रुपये के नोटों से वित्तीय लेन-देन नहीं होगा। 2016 में, नोटबंदी के कारण कई नागरिक अपनी जान गंवा बैठे।

हालांकि, वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल लेन-देन में वृद्धि के कारण दिन-प्रतिदिन के लेन-देन पर प्रभाव देखा जाना बाकी है। आरबीआई सूत्रों का कहना है कि उन्होंने 2013-14 में भी चलन में रहे नोटों को वापस ले लिया है। दूसरी तरफ रूस के विदेश मंत्री ने यह बयान दे दिया है कि रूस स्थित भारतीय बैंकों में व्यापक पैमाने पर भारतीय मुद्रा बेकार पड़ी हुई है। तमाम दलीलों के बीच यह जनता के बीच का सवाल है कि फिर स्विस बैंकों में किन भारतीयों का पैसा साल दर साल बढ़ रहा है।