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स्विस बैंक में काला धन बढ़ा तो देश में गरीबी भी बढ़ी

  • आठ नवंबर 2016 को हुआ था फैसला

  • कोई कालाधन इससे वापस नहीं मिला

  • स्विस बैंक में जमा भारतीय पैसा और बढ़ा

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक नोटबंदी का फैसला छह वर्ष पूर्व आठ नवंबर की रात को लिया गया था। वर्ष 2016 के इस फैसले के वक्त दावा किया गया था कि पांच सौ और एक हजार के नोट रद्द किये जाने से सारा कालाधन बाहर आ जाएगा। इन छह वर्षों में यह दावा गलत साबित हुआ है।

दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों ने जिन परेशानियों का उल्लेख किया था, वे एक एक कर सामने आ रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक अभी देश में पहले की तुलना में बहुत अधिक पैसा जनता के पास है। जब नोटबंदी हो रही थी तो बाजार में 17.7 लाख करोड़ रुपये प्रचलन में थे। आज की तारीख में यह बढ़कर 30.99 लाख करोड़ हो गया है।

यानी इन छह वर्षों में भारतीय रिजर्व बैंक ने बहुत अधिक नोट छापे हैं। पिछले छह वर्षों में करेंसी करीब 71.84 प्रतिशत बढ़ गयी है। लेकिन यह नकदी दरअसल किसके पास है, यह सवाल अब ज्यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है। दीपावली के बाजार में करीब साढ़े सात हजार करोड़ का इस्तेमाल नहीं होने की वजह से आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों का ध्यान इस तरफ गया था। कई सूत्रों ने बाजार से करीब सात लाख करोड़ रुपया गायब हो जाने की बात कही है लेकिन इसका औपचारिक एलान किसी सरकारी एजेंसी की तरफ से नहीं किया गया है।

देश में कोरोना का प्रकोप होने के बाद डिजिटल लेनदेन में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन भारतीय स्टेट बैंक की गणना के बाद दरअसल कितने नोट वाकई बाजार में चालू हालत में हैं, इस पर बहस शुरु हो चुकी है। प्रधानमंत्री जनधन योजना के बैंक खाता का प्रचार होने क बाद भी देश की आबादी में से करीब 15 करोड़ लोगों के नाम पर कोई बैंक खाता नहीं है। लिहाजा इनके पास रिकार्ड में दर्ज पैसा होने का कोई तर्क नहीं है।

दूसरी तरफ यह भी पता चला है कि कोरोना लॉकडाउन की वजह से नौकरी गंवाने तथा कारोबारी घाटा की वजह से अनेक लोग फिर से गरीबी रेखा से नीचे आ गये हैं। इसके बाद भी अधिक नोट छापने का लाभ किसे मिला है और यह नकदी दरअसल किन तिजोरियों में कैद हो रहा है, यह सवाल महत्वपूर्ण बनता जा रहा है।

आंकड़े यह भी बता रहे हैं कि इस बीच स्विस बैंक में भारतीयों के जमा रकम में भी बढ़ोत्तरी हुई है। इसलिए यह समझने वाली बात है कि दरअसल भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अधिक नोट छापने के बाद भी उसका बड़ा हिस्सा बाजार से गायब होने का असली लाभ किसे मिल रहा है।[ads1]