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ऐसे घोटालों पर चुप्पी ही भरोसा तोड़ देती है

आम तौर पर जनता या यूं कहें कि मतदाताओं को यह विश्वास होता है कि सरकार, चाहे वह केंद्र की हो अथवा राज्य की, अपनी जनता के हितों की रक्षा करेगी। जब जब ऐसा नहीं होता है जनता का विश्वास डगमगाने लगता है। अब डीवीसी के इस महाघोटाले पर पिछले चार दशक से अधिक समय से जारी संघर्ष में चार गांव के हजारों लोगों का भविष्य जुड़ा होने क बाद भी सरकार की कानों तक इसकी आवाज का नहीं पहुंचना ही जनता का भरोसा तोड़ने वाली कार्रवाई है।

दूसरों के हक की हकमारी हो और वहां के राजनेता चुप रहे, यह भारतीय राजनीति के लिए बड़ी अजीब बात है। फिर भी यह सवाल प्रासंगिक है और इतना पुराना होने के बाद भी वे सवाल आज भी उसी तरीके से खड़े हैं, जिनसे डीवीसी प्रबंधन के अलावा पश्चिम बंगाल, बिहार और अब झारखंड के साथ साथ केंद्र सरकार भी पर्दा डालने का काम करती आयी है।

इस मामले की छानबीन से एक नई जानकारी सामने आयी है कि सिर्फ मैथन और पंचेत डैम के लिए जमीन अधिग्रहण में ही ऐसा नहीं हुआ है। रांची के पास के सिकिदिरी डैम के लिए जमीन के अधिग्रहण में भी फर्जी गांवों के नाम पर मुआवजा देने का खेल हो चुका है, जिनके सबूत बड़ी चालाकी से गायब कर दिये गये हैं।

खैर असली मुद्दे पर लौटें तो साफ है कि झारखंड के लोगों का हक मारा गया है और इसकी जानकारी नीचे से ऊपर तक सभी संबंधित पक्षों को होने के बाद भी चुप्पी क्यों है, इस सवाल का उत्तर तलाशना ज्यादा प्रासंगिक है। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई मुद्दा शिकायत के तौर पर सरकार के पास आये तो वह दस लोगों की आंखों के सामने से ना गुजरे।

तो क्या किसी ने भी इस मुद्दे की गंभीरता को नहीं समझा अथवा केंद्र से जांच के लिए आयी चिट्ठी को भी नकारा समझकर कूड़े के ढेर में डाल दिया। सामान्य समझ की बात है कि सरकार में कोई भी पत्र कभी खत्म नहीं होता। एक बार कार्यालय में दाखिल होने के बाद वह एक नहीं कई स्थानों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। दरअसल सरकार, चाहे वह राज्य की हो अथवा केंद्र की, अफसरशाही ने बचाव का एक आसान तरीका खोज रखा है।

वह है फाइल पर यह लिखना कि विमर्श करें। सामान्य तौर पर यह समझा जा सकता है कि इस फाइल पर संबंधित अधिकारी अधिक जानकारी चाहता है। लेकिन झारखंड के संदर्भ में कहें तो इस टिप्पणी का अर्थ है कि फाइल को बंद रखा जाए क्योंकि फाइल पर दर्ज विमर्श करें के साथ कोई समयसीमा नहीं होती है।

झारखंड में एक सूचना तकनीक आधारित फाइल ट्रेकिंग पद्धति भी बनायी गयी थी, जो यह बताता था कि कोई भी फाइल किस टेबल पर कब से कब तक रूकी है। यह पद्धति कुछ रेलवे के जैसी थी, जिसमें यह कंट्रोल रुम को पता चलता रहता था कि कौन सी रेलगाड़ी पटरी पर कहां से गुजर रही है। लेकिन झारखंड के अफसरों को इस फाइल ट्रेकिंग से तकलीफ होने की वजह से उसे बंद कर दिया गया। लिहाजा डीवीसी से संबंधित दिल्ली से आयी फाइल अंततः किस टेबल पर जाकर गुम हो गयी, यह सिर्फ संबंधित विभागों के अधिकारी ही जान सकते हैं। मामला सिर्फ यहीं का नहीं है।

इसकी शिकायत सुप्रीम कोर्ट तक गयी थी। वहां से भी निर्देश जारी हुए थे लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों के बीच फाइल फाइल के खेल में यह निर्देश भी कहीं गुम हो गये हैं। असली मुद्दा झारखंड के लोगों के साथ हुए अन्याय का प्रतिकार है। इस मामले में राजनीतिक दल चुप क्यों हैं, यह झारखंड राज्य के गठन से जुड़ा हुआ प्रासंगिक मामला है। झारखंड आंदोलन के समय से यह शिकायत रही है कि झारखंड के लोगों का अधिकार दूसरे राज्यों से आये लोग छीन रहे हैं।

उदाहरण एचईसी का है, जहां विस्थापित आज भी दयनीय हालत में हैं जबकि एचईसी में दूसरे राज्यों और खासकर बिहार के कुछ खास जिलों से आये लोगों का वर्चस्व स्थापित हो गया। यह अलग बात है कि अब खुद एचईसी ही अपने अधिकारियों और कर्मचारियों की करनी की वजह से मरणासन्न स्थिति में है। दूसरी तरफ निजी कंपनियों से अधिक निजी लाभ ने सरकार के नीति निर्धारकों को भी एचईसी को बचाने की पहल करने से रोक दिया है।

डीवीसी के मामले में यह तो साफ है कि झारखंड के विस्थापितों के नाम पर पश्चिम  बंगाल के वैसे लोगों को फायदा दिया गया है, जो प्रभावित इलाकों के निवासी अथवा विस्थापित भी नहीं थे। इसे जानने के बाद भी इस मामले में चुप्पी सामाजिक स्तर पर राजनीतिक दलों से यह सवाल पूछने का अवसर देती है कि उनके लिए झारखंडी जनता का हित दरअसल क्या है जबकि यहां हजारों झारखंडी आदिवासियों और मूलवासियों का हित मारा गया है।