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सेबी की दलील से शक पुख्ता होता है

अडाणी समूह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर भी जांच में सेबी को शायद दिक्कत है। सेबी ने इसके लिए तकनीकी मुद्दों का हवाला देते हुए छह माह का और समय मांगा है। इसके बीच ही यह पता चल रहा है कि विवाद के केंद्र में जो विदेशी पैसा गौतम अडाणी के बड़े भाई विनोद अडाणी के जरिए आया है, उसके सबूत खत्म किये जा रहे हैं।

विनोद अडाणी ने इस समूह की कई कंपनियों से अपना नाता तोड़ लिया है। इन तमाम घटनाक्रमों से यह संदेह और पुख्ता होता है कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद राहुल गांधी द्वारा जो बीस हजार करोड़ का सवाल उठाया गया था, उसपर भरोसा करने का आधार मौजूद है। घटनाक्रम भी यही बताते हैं कि अडाणी प्रकरण पर भाजपा की चुप्पी शक को बढ़ाने वाली है।

कर्नाटक के चुनाव में भी यह मुद्दा कहीं न कहीं असर दिखायेगा। दूसरी तरफ महिला पहलवानों का आंदोलन भी देश में किसान आंदोलन जैसी मानसिकता पैदा करने लगा है। दरअसल अडानी समूह द्वारा शेयर बाजार के नियमों के उल्लंघन और दुर्व्यवहार के बारे में हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित समय सीमा समाप्त होने से महज दो दिन पहले भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अपने निष्कर्षों को अंतिम रूप देने के लिए अदालत से कम से कम छह महीने का और समय मांगा है।

जनवरी के अंत में हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद अडानी समूह के अधिकांश शेयरों की कीमतों में गिरावट के बाद, अदालत ने एक जनहित याचिका पर प्रतिक्रिया करते हुए निवेशकों के नुकसान के पीछे के कारकों की जांच करने और नियामक विफलताओं का पता लगाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था।

हिंडनबर्ग-अडानी से जुड़े मुद्दों को ‘कमरे में हाथी’ करार देने वाले सेबी प्रमुख को यह सुनिश्चित करना था कि समिति को वह जानकारी मिले जिसकी उसे जरूरत है। इसके अलावा, अदालत ने नियामक को अपने नियमों के उल्लंघन के लिए समूह के खिलाफ चल रही जांच को तेजी से पूरा करने का काम सौंपा। इसमें यह भी देखने की मांग की गई है कि क्या समूह ने न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता मानदंडों का उल्लंघन किया है, संबंधित-पार्टी लेनदेन का खुलासा करने में विफल रहा है, और स्टॉक की कीमतों में हेरफेर किया है।

सेबी और पूर्व न्यायाधीश एएम सप्रे की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति के लिए निर्धारित दो महीने की समय सीमा 2 मई को समाप्त हो रही है। अंतिम समय में सेबी की ओर से और वक्‍त मांगे जाने से न्यायमूर्ति सप्रे की समिति के विचार-विमर्श अगर पटरी से नहीं उतारेगी, तो कम से कम प्रभावित जरूर करेगी। नियामक ने कुछ मुद्दों पर प्रथम दृष्टया दृष्टिकोण पेश किया है, जिसमें एक दर्जन संदिग्ध लेनदेन शामिल हैं जो वित्तीय गलतबयानी, मानदंडों को दरकिनार करने और संभावित धोखाधड़ी से संबंधित हैं।

हालांकि, इसने लेनदेन की जटिलताओं का हवाला देते हुए तर्क दिया है कि विस्तृत मूल्यांकन में आम तौर पर 15 महीने लगेंगे जिसे वह छह महीने में पूरा करने की कोशिश कर रहा है। निवेशकों के हितों की रक्षा के प्राथमिक जनादेश वाले एक पेशेवर और स्वतंत्र नियामक द्वारा खेले गए जटिलता कार्ड की योग्यता को यदि एक बारगी छोड़ भी दिया जाए, तो सुझाई गई समयसीमा निरर्थक है।

यदि सेबी इस नवंबर तक अदालत को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर भी देता है, तो यह हिंडनबर्ग रिपोर्ट के 10 महीने पूरे होने पर होगा और समूह के खिलाफ शिकायतों की जांच शुरू होने के लगभग दो साल बाद होगा। जहां गड़बड़ी पाई गई है, उनकी पुष्टि करने में छह महीने का समय नहीं लगता है। अंतरिम निष्कर्षों को उचित समझे जाने वाली किसी भी चेतावनी के साथ ठीक उसी तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जैसे बड़ी तस्वीर को उजागर करने के नाम पर उन्हें माफ करने के बजाय स्थापित उल्लंघनों पर अंतरिम आदेश पारित किए जा सकते हैं (निवेशकों को सूचित और संरक्षित करने हेतु)।

एक ऐसा मुद्दा जिसने सत्यम विवाद और आईएलएंडएफएस विवाद से कहीं ज्‍यादा बड़े पैमाने पर भारतीय बाजार और इसके प्रशासन संबंधी मानकों को कमजोर किया हो, उसमें सेबी की मौजूदा याचिका विश्वास पैदा नहीं करती है। और यह भारत के वित्तीय बाजारों के निवेशकों के लिए बुरी खबर है।

इससे उन आरोपों को दम मिलता है, जो देश के मध्यमवर्ग को प्रभावित करते हैं। दरअसल केंद्र सरकार अपनी सोच के हिसाब से जैसे जनता को जिस दिशा में ले जाना चाहती है, उसका असर इन घटनाक्रमों से कम कर दिया है। लिहाजा यह भी माना जा सकता है कि जिस नरेंद्र मोदी के राजनीतिक कद को भाजपा के प्रचार तंत्र ने ही लार्जर दैन पार्टी यानी पार्टी से भी ऊपर बनाया था, वही राजनीतिक कद अब भाजपा के लिए सरदर्द बन रहा है। चौक चौराहों पर लोग भाजपा वालों से उन सवालों का उत्तर जानना चाहते हैं, जिन पर नरेंद्र मोदी मौन धारण किये हुए हैं।