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विपक्षी एकता यानी चिंदी से तंबू बनाने का खेल

विपक्षी एकता की बात तो सभी भाजपा विरोधी दल कह रहे हैं लेकिन यह भी स्पष्ट है कि ऐसी बयानबाजी के बीच भी हर दल के दिल में कुछ गुप्त एजेंडा भी है। इसका खुलासा पहले भी होता रहा है और अब एनसीपी नेता शरद पवार की एक राय ने उसे खोलकर सभी के सामने रखा दिया है।

अपने एक चर्चित इंटरव्यू में अडाणी मसले पर जो कुछ कहा, उसके बाद विपक्षी खेमे में उथलपुथल की स्थिति पैदा हो गई है। उन्होंने जहां अडाणी ग्रुप को टारगेट किए जाने की आशंका जताई, वहीं यह भी कह दिया कि इस मामले की जेपीसी यानी संयुक्त संसदीय समिति से जांच करवाने का कोई फायदा नहीं होगा।

उनके मुताबिक, चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर उसे जांच की जिम्मेदारी सौंप दी है, इसलिए अब जेपीसी जांच पर जोर देने की कोई वजह नहीं है। इस इंटरव्यू के बाद विपक्षी खेमे में अफरातफरी मचना स्वाभाविक ही था।इससे पहले विपक्ष की 20 पार्टियां मिलकर जेपीसी जांच की मांग कर रही थीं। इस इंटरव्यू के प्रसारित होने से मेसेज यह गया कि विपक्षी खेमा इस मामले में अब एकजुट नहीं रह गया है।

ध्यान रहे, शरद पवार का यह इंटरव्यू ऐसे समय आया, जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने विपक्षी एकजुटता को लेकर विभिन्न पार्टियों से संपर्क करने की कवायद शुरू की थी। ऐसे में यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर शरद पवार का इरादा क्या है। हालांकि कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने क्षतिपूर्ति की कोशिश तत्काल शुरू कर दी है।

जयराम रमेश सहित कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं ने कहा कि शरद पवार की राय इस मसले पर भले ही अलग हो, अन्य पार्टियों का रुख बिलकुल साफ है और कांग्रेस उन दलों के साथ मिलकर यह मुद्दा उठाती रहेगी। शिवसेना (उद्धव गुट) के संजय राउत ने भी कहा कि शरद पवार के इस बयान का विपक्षी एकता के प्रयासों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

लेकिन ये नेता कुछ भी कहें, सच तो यही है कि इस पर असर पड़ चुका है। विपक्षी खेमे में असमंजस और कन्फ्यूजन साफ दिख रहा है। भाकपा के डी राजा ने कहा कि अलग-अलग लोग अलग-अलग राय व्यक्त कर रहे हैं, इसलिए देखना पड़ेगा कि क्या स्थिति बनती है।इस बीच कांग्रेस की ही अलका लांबा ने शरद पवार को लालची नेता बताते हुए उनकी उद्योगपति गौतम अडाणी के साथ एक तस्वीर भी ट्वीट कर दी।

विपक्षी खेमे में इस फूट का भाजपा स्वाभाविक तौर पर फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब एनसीपी का अगला कदम क्या होगा। शरद पवार इस बयान से, दरअसल क्या हासिल करना चाहते हैं, इसे लेकर भी अटकलें लग रही हैं। इस सवाल का जवाब तो आगे चलकर ही मिलेगा। तब तक के लिए कांग्रेस को एक झटका उन्होंने जरूर दे दिया है। इससे यह भी साफ हो गया है कि विपक्षी एकता की गाड़ी सरपट नहीं भागने वाली।

यह ऊबड़-खाबड़ रास्ते से होते हुए धीरे-धीरे ही आगे बढ़ेगी।कर्नाटक में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में राज्य में किसकी सरकार बनेगी इसको लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने कहा है कि कर्नाटक के चुनाव में भी भाजपा को सिर्फ मोदी के नाम का आसरा है। शरद पवार ने कहा कि, कर्नाटक में अगले महीने चुनाव होने वाले है। ऐसे में इस चुनाव में कांग्रेस के जीतने की संभावना बनी हुई है।

उन्होंने कहा कि चुनाव दो तरह के होते हैं- केंद्र के लिए राष्ट्रीय चुनाव और राज्यों के चुनाव। ऐसे में कर्नाटक के विधानसभा चुनाव को अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि भाजपा अपने चुनाव अभियान में राष्ट्रीय मुद्दों को राज्य के मुद्दों से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भाजपा की सरकार नहीं है। इसलिए जमीनी हकीकत है कि इस बार भाजपा का कर्नाटक में जीत पाना काफी ज्यादा मुश्किल होगा।

अडाणी प्रकरण पर अपनी बात रखने के साथ साथ अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों को लेकर शरद पवार ने कहा कि, अगर विपक्ष को 2024 के चुनावों में जीतना है तो उनको एकजुट होकर लड़ने की जरूरत हैं, अन्यथा लोकसभा चुनाव में भाजपा को हरा पाना आसान नहीं होगा। पवार ने आगे कहा कि, अगर हम लोगों ने भाजपा को नजरअंदाज किया तो विपक्ष मिलकर भी कुछ खास नहीं कर पाएगा।

बता दें, शरद पवार की पार्टी एनसीपी महाराष्ट्र में कांग्रेस और शिवसेना ( उद्धव गुट) के साथ गठबंधन में थी। लेकिन एकनाथ शिंद की बगावत के बाद ये सरकार गिर गई। इसलिए स्पष्ट हो गया है कि उनके एक बयान ने भाजपा विरोधी खेमाबंदी की सच्चाई को सामने ला दिया है। अपने अपने गुप्त एजेंडे पर काम कर रहे दलों पर मतदाताओं को भरोसा कैसे कायम हो, यह सोचना ऐसे दलों की जिम्मेदारी है।