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अघोषित आपातकाल की आहट

भारतीय लोकतंत्र आज एक अभूतपूर्व और गंभीर मोड़ पर खड़ा है। स्वतंत्रता के बाद देश ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन वर्तमान में जो परिस्थितियां आकार ले रही हैं, वे लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं। अमूमन जब भी भारतीय राजनीति में दमन और असहमति को कुचलने की बात होती है, तो 1975 के घोषित आपातकाल की याद ताजा हो जाती है।

उस समय कानूनन आपातकाल की घोषणा की गई थी और राजनीतिक विरोधियों को जेलों में ठूंस दिया गया था। लेकिन आज जिस तरह के परिदृश्य का सामना देश कर रहा है, वह किसी अघोषित आपातकाल से कम नहीं लगता। बल्कि गहराई से आकलन करें, तो मौजूदा दौर की कड़ाई और संस्थागत क्षरण 1975 के दौर से भी कहीं अधिक चिंताजनक प्रतीत होता है।

दिल्ली की सड़कों पर जो कुछ घटित हो रहा है, उसे किसी भी सूरत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन और नागरिक चेतना की अभिव्यक्ति उसका हृदय होती है। लेकिन आज केवल सड़कों पर प्रदर्शन करने से ही नहीं रोका जा रहा, बल्कि इतिहास में जो स्थल जन-आंदोलनों और शांतिपूर्ण विरोध के केंद्र रहे हैं, उन्हें भी जनता की पहुंच से दूर किया जा रहा है।

जंतर-मंतर, जो कभी देश के आम नागरिक की आवाज को हुक्मरानों तक पहुंचाने का सबसे बड़ा मंच था, वहां तिरंगा लेकर पहुंचने वाले सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) के दो शीर्ष नेताओं को पांच दिनों की जेल में भेज दिया जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सत्ता असहमति के प्रति कितनी असहिष्णु हो चुकी है।

राष्ट्रीय ध्वज लेकर अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से रखना यदि अपराध माना जाने लगे, तो समझना चाहिए कि शासन व्यवस्था नागरिक अधिकारों से भयभीत है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में भारत का चुनाव आयोग और उसकी गिरती हुई साख है। निष्पक्ष चुनाव किसी भी जीवंत लोकतंत्र की आत्मा होते हैं।

चुनाव आयोग की कथित गड़बड़ियों और स्वतः प्रमाणित विरोधाभासों के बावजूद जिस तरह से न्यायिक प्रक्रिया में तारीख पर तारीख का खेल चल रहा है, उससे आम जनता का विश्वास न्यायपालिका से भी डगमगाने लगा है। भारतीय जनता पार्टी के नेता मूल मुद्दों पर बात करने से पूरी तरह कतरा रहे हैं। आखिर ऐसी क्या मजबूरी या वजह है कि सरकार हर कीमत पर मुख्य चुनाव आयुक्त का बचाव करने में जुटी है? एक पूर्व नौकरशाह के प्रति सरकार की यह अति-मेहरबानी कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

क्या उस दफ्तर के बंद कमरों में ऐसे कई गहरे राज दफन हैं, जिनके बाहर आने से सत्ता के गलियारों में तूफान आ सकता है? वहीं दूसरी ओर, आरोपों के घेरे में आईं सीमा खन्ना की रहस्यमयी चुप्पी इस मामले को और अधिक पेचीदा बनाती है। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस बात की जबरदस्त चर्चा है कि उनसे अनौपचारिक रूप से इस्तीफा ले लिया गया है, फिर भी आधिकारिक स्तर पर कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आ रहा है।

इस चुप्पी के बीच एक और बात बिल्कुल साफ नजर आ रही है— चुनाव आयोग के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। अपनी नाराजगी दर्ज कराने वाले दो अन्य चुनाव आयुक्त अपनी बात पर अडिग हैं और पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। यदि सत्ता का दबाव पूरी तरह काम कर रहा होता, तो वे अब तक एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर तमाम आरोपों को गलत और मनगढ़ंत बता चुके होते।

उनका मौन और रुख सरकार के दावों की पोल खोल रहा है। सत्ता पक्ष को यह सोचना होगा कि नागरिक अधिकारों को कुचलकर और असहमति की आवाजों को जेल की सलाखों के पीछे भेजकर देश का लोकतंत्र कैसे मजबूत हो सकता है? लोकतंत्र की मजबूती संस्थाओं की स्वायत्तता और संवाद से आती है, न कि कड़े प्रतिबंधों और पुलिसिया दमन से।

हालांकि, इस निराशाजनक स्थिति का एक दूसरा और बेहद सकारात्मक पहलू भी है। भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक मानसिकता हमेशा से अन्याय के खिलाफ खड़े होने की रही है। इतिहास गवाह है कि इस देश की जनता को जितना दबाने का प्रयास किया जाता है, उसका जन-विरोध उतना ही मुखर, सशक्त और संगठित होकर उभरता है।

सत्ता की यह अनियंत्रित कड़ाई शायद इस बात का प्रमाण है कि विरोध की यह उठती हुई लहर हुक्मरानों को असहज कर रही है। यदि संवैधानिक मर्यादाओं को इसी तरह ताक पर रखा गया, तो जन-आक्रोश का यह ज्वार आने वाले समय में लोकतंत्र की वास्तविक पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त करेगा। कुल मिलाकर यह माना जा सकता है कि समय के गर्भ में अनेक अप्रत्याशित तथ्य हमेशा छिपे होते हैं। वरना आज के चंद माह पूर्व कोई यह मान सकता था कि नरेंद्र मोदी की सरकार को इस तरीके से चुनौती मिलेगी। या विपक्ष के सवालों का उत्तर देने के बजाए गृहमंत्री अमित शाह सदन से ही गायब हो जाएंगे।