जंतर मंतर पर पूर्ण प्रतिबंध खारिज किया था
तीन वैकल्पिक स्थान बताये गये हैं
पहले भी यह प्रस्ताव खारिज हुआ था
विरोध प्रदर्शन पर पूर्ण रोक गलत है
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः दिल्ली पुलिस ने सोमवार को जंतर-मंतर की एक निर्धारित विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचना समाप्त कर दी। इसके साथ ही राजधानी में धरना और प्रदर्शन आयोजित करने के लिए तीन नए स्थानों—रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड—की घोषणा की गई है।
इस संदर्भ में यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आठ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निर्णय दिया था कि मध्य दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों पर पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया था कि भीड़भाड़ वाले इलाके में स्थित रामलीला मैदान विरोध प्रदर्शनों की सभी जरूरतों को पूरा करने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो सकता है। लिहाजा इस पूर्व के फैसले की फिर से चर्चा होने लगी है।
उक्त मामले में अदालत मजदूर किसान शक्ति संगठन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें धारा 144 को मनमाने और बार-बार लागू करने के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसने जंतर-मंतर को सार्वजनिक सभा, धरना या शांतिपूर्ण विरोध आयोजित करने के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण के उस फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों पर भी सुनवाई की थी, जिसमें अधिकारियों को जंतर-मंतर रोड पर सभी धरना, विरोध प्रदर्शनों, लोगों के एकत्र होने, भाषणों और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को तुरंत रोकने का निर्देश दिया गया था। एनजीटी ने आदेश दिया था कि प्रदर्शनकारियों को तुरंत अजमेरी गेट स्थित रामलीला मैदान में वैकल्पिक स्थल पर स्थानांतरित किया जाए। एनजीटी का यह फैसला उन स्थानीय निवासियों की याचिकाओं पर आया था, जिन्होंने जंतर-मंतर पर लगातार होने वाले प्रदर्शनों के कारण होने वाली भारी परेशानियों की शिकायत की थी।
एनजीटी द्वारा पारित आदेश की समीक्षा करते हुए न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने अपने 2018 के फैसले में विरोध प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध की कड़ी आलोचना की थी और एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया था। दिलचस्प बात यह है कि अदालत ने याचिकाकर्ता के इस तर्क से एक हद तक सहमति जताई थी कि विरोध प्रदर्शन प्रभावी होने के लिए सत्ता के केंद्र के करीब किसी क्षेत्र में आयोजित किए जाने चाहिए। हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि सोशल मीडिया के इस दौर में केवल भौतिक निकटता ही कोई अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती है।
अदालत ने इस बात पर भी विशेष बल दिया कि कोई भी व्यक्ति किसी विशेष स्थान पर ही विरोध प्रदर्शन करने के अपने अधिकार का दावा या जिद नहीं कर सकता। अदालत का मानना था कि चूंकि जंतर-मंतर अधिकारियों द्वारा चुना गया क्षेत्र था और काफी समय से उपयोग में था, इसलिए इस क्षेत्र के एक सीमित हिस्से को शांतिपूर्ण बैठकों और जुलूसों के लिए अनुमति देकर संतुलन बनाया जा सकता है। यह व्यवस्था कम से कम छोटे समूहों को इस तरह दी जानी चाहिए कि स्थानीय निवासियों को कोई असुविधा न हो।
इसलिए, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस आयुक्त को अन्य संबंधित एजेंसियों के परामर्श से जंतर-मंतर क्षेत्र के सीमित उपयोग के लिए एक उचित तंत्र तैयार करने का निर्देश दिया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि प्रदर्शनों को इस तरह से विनियमित किया जाए कि जंतर-मंतर रोड के निवासियों या वहां स्थित कार्यालयों को कोई परेशानी न हो। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया था कि किसी विशेष समूह द्वारा प्रदर्शन आयोजित करने के लिए पुलिस आयुक्त से पूर्व अनुमति लेने का प्रावधान लागू किया जा सकता है।
हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस सुझाव पर विचार करने के लिए कहा था कि प्रदर्शनकारियों के लिए पर्याप्त सुविधाओं से युक्त किसी अन्य स्थान को जंतर-मंतर के स्थान पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए चिह्नित किया जाए या नहीं। अदालत ने यह निर्देश तब जारी किया जब दिल्ली में चल रहे मुख्य चुनाव आयुक्त/विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) विरोधी प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को सूचित किया कि सक्षम प्राधिकारी शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर के अलावा किसी अन्य स्थान को नामित करने पर विचार करेगा।