फिर से उपलब्धि को डूबाने की रणनीति
हर जगह मौजूद यूपीआई, जिसने हजारों वर्षों के बाद भारतीयों के भुगतान करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया और दुनिया के लिए भारत के सबसे बड़े योगदानों में से एक बन गया, अब कुछ अपवादों को छोड़कर पूरी तरह निःशुल्क नहीं रहेगा। 15 अक्टूबर से, व्यापारियों को 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत का उपयोगकर्ता शुल्क — जिसे मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) भी कहा जाता है — देना होगा।
यद्यपि यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस की शुरुआत 11 अप्रैल, 2016 को हुई थी, लेकिन इस अवधारणा पर काम साल 2012 में ही शुरू हो गया था। उस समय नंदन नीलेकणी के नेतृत्व में बैंकरों और उद्योग विशेषज्ञों का एक समूह एक मोबाइल-फर्स्ट, इंटरऑपरेबल भुगतान प्रणाली को डिजाइन करने के लिए एक साथ आया था। हालांकि, इसकी असली सफलता तब मिली जब सरकार ने कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए 1 जनवरी, 2020 को यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर को समाप्त कर दिया।
कुछ ही वर्षों में, यूपीआई अत्यधिक सफल हो गया। सड़क किनारे सामान बेचने वाले रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े खुदरा विक्रेताओं तक, सभी ने मोबाइल फोन के माध्यम से तुरंत पैसे प्राप्त करना शुरू कर दिया। लेकिन इस पूरी प्रणाली का खर्च मुख्य रूप से सरकार, बैंकों और भुगतान कंपनियों द्वारा उठाया जा रहा था। वर्तमान में, भारत में लगभग 85 प्रतिशत खुदरा लेनदेन यूपीआई के माध्यम से ही होते हैं।
इतने अधिक सफल मॉडल में बदलाव करना किसी भी सरकार के लिए बेहद कठिन होता। हालांकि, जो बैंक इस लागत को आपस में साझा कर रहे थे, उन्होंने सरकार पर यह दबाव बढ़ा दिया कि उन्हें कम से कम उन लोगों से शुल्क लेने की अनुमति दी जाए जो भुगतान करने में सक्षम हैं। 15 अक्टूबर से चुनिंदा यूपीआई भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत का एमडीआर पेश करने का सरकार का निर्णय इस प्रणाली के पूर्ण शून्य-शुल्क युग के अंत का प्रतीक है, लेकिन यह यह भी सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति-से-व्यक्ति (पी2पी) लेनदेन पूरी तरह से मुफ्त बने रहें।
अन्य श्रेणियों के लिए भी, एमडीआर बेहद सीमित रहेगा। यह केवल 2,000 रुपये से अधिक के व्यक्ति-से-व्यापारी लेनदेन पर लागू होगा और इसका भुगतान ग्राहक द्वारा नहीं, बल्कि व्यापारी द्वारा किया जाएगा। यूपीआई क्यूआर कोड के माध्यम से प्रति माह 1 लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को भी इससे छूट दी गई है। रेलवे, ईंधन, दूरसंचार, बीमा, उपयोगिता सेवाओं, शिक्षा और कृषि इनपुट सहित आवश्यक और कम मार्जिन वाले क्षेत्रों के लिए, शुल्क प्रति लेनदेन 5 रुपये तक सीमित रहेगा।
75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर मानक एमडीआर अधिकतम 300 रुपये तक सीमित होगा। अनुमान है कि इससे केवल चार प्रतिशत व्यापारी लेनदेन ही प्रभावित होंगे। सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि गरीब और मध्यम वर्ग को एमडीआर से अप्रभावित रखने के लिए सभी आवश्यक सुरक्षा उपाय मौजूद हों। हालांकि, इन सुरक्षा उपायों को कड़ाई से लागू करना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी।
कुछ व्यापारी कुछ और रुपये कमाने के लालच में सभी लेनदेन पर यूपीआई शुल्क लगाकर इस शुल्क की भरपाई करने की कोशिश कर सकते हैं। वे नकद भुगतान पर छूट दे सकते हैं या बिलों को 2,000 रुपये से कम के लेनदेन में विभाजित कर सकते हैं। ऐसी प्रथाएं नीति और अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने की दिशा में हासिल की गई प्रगति दोनों को कमजोर कर देंगी।
सरकार का यह निर्देश कि एमडीआर का बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाना चाहिए, एक सुलभ शिकायत तंत्र और बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए कड़े दंड के साथ समर्थित होना चाहिए। यदि सरकार इस बदलाव को अच्छी तरह से प्रबंधित करने में विफल रहती है, तो भारत एक बार फिर मुख्य रूप से नकद-आधारित अर्थव्यवस्था में वापस जा सकता है।
यदि ऐसा होता है, तो कुछ रुपयों के लिए अत्यधिक सफल यूपीआई प्रणाली को कमजोर करने के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यह कुछ वैसा ही होगा जैसे कोई लालची और अति महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति उस मुर्गी को मार दे जो सोने के अंडे देती थी। फिलहाल सरकार का फैसला मुर्गी को मारने वाला ही साबित होने जा रहा है।
जिस मुद्दे पर अब तक कोई चर्चा नहीं हुई, वह यह है कि अब उपभोक्ता नकद अपने पास रखेगा यानी बैंकों में पूंजी की तरलता घटती चली जाएगी। इससे बैंकों का जो आंकड़ा हमें दिखाया जा रहा है, वह भी जमीन पर आ गिरेगा। सिर्फ संचालन के बहाने यह टैक्स लेने के बदले तो मोदी सरकार को वह पैसा खर्च करना था, जो उसने आरबीआई और बैंकों के मुनाफे से हासिल किया है। हर बात पर उपभोक्ता को हलाल करने की सोच अच्छी तो कतई नहीं है।