राजनीतिक संवाद का नया व्याकरण और परिसर की चिंता
दिल्ली विश्वविद्यालय का प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स जब अपनी स्थापना का शताब्दी समारोह मना रहा था, तब देश भर की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि देश के सबसे शीर्ष मेधावी युवाओं के मंच से शिक्षा, नवाचार और भविष्य के भारत का कैसा दृष्टिकोण सामने आता है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद उभरी चर्चाओं ने शिक्षा जगत और राजनीतिक विश्लेषकों को एक नए मोड़ पर खड़ा कर दिया है।
छात्रों के बीच दिमागी नक्सल और नाराज फूफा जी जैसे तीखे राजनीतिक तंजों का इस्तेमाल अब एक नए तरह के राजनीतिक संवाद का परिचायक बन चुका है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में दिमागी नक्सल शब्द का उल्लेख करते हुए इसे होम्योपैथी की दवा जैसा करार दिया, जिसकी खुराक मिलने पर असली मरीज खुद-ब-खुद बेनकाब हो जाते हैं। इसके साथ ही, पारंपरिक पारिवारिक ताने-बाने से निकाले गए नाराज फूफा जी वाले मुहावरे का प्रयोग कर आलोचकों पर निशाना साधा गया।
इन रूपकों की भाषा भले ही आम जनमानस को गुदगुदाने या सीधा संवाद साधने के इरादे से चुनी गई हो, लेकिन एक ऐतिहासिक शैक्षणिक संस्थान के मंच से जब ऐसे तीखे तंज उछाले जाते हैं, तो उनके निहितार्थ गहरे हो जाते हैं। राजनीति विज्ञान के विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयानों के जरिए वैचारिक विरोधियों को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी न मानकर उन्हें मानसिक या वैचारिक रूप से रोगी या नकारात्मक साबित करने की रणनीति अपनाई जाती है।
श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स देश का वह प्रमुख संस्थान है जिसने भारत को कई शीर्ष अर्थशास्त्री, नीति-निर्माता, उद्योगपति और ब्यूरोक्रेट्स दिए हैं। ऐसे संस्थान में उपस्थित मेधावी युवाओं की मूल अपेक्षाएं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शोध के घटते बजट, वैश्विक विश्वविद्यालयों से प्रतिस्पर्धा, रोजगार के बदलते प्रारूप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे विषयों पर किसी दूरदर्शी नीति-रोडमैप को सुनने की होती हैं।
इसके विपरीत, जब किसी शताब्दी समारोह जैसे ऐतिहासिक और अकादमिक अवसर का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर पलटवार करने और चुनावी या वैचारिक लाभ उठाने के लिए होता है, तो इससे कुछ बुनियादी सवाल पैदा होते हैं। क्या अकादमिक और ऐतिहासिक मंचों का उपयोग विशुद्ध राजनीतिक और वैचारिक युद्ध क्षेत्र के रूप में किया जाना उचित है? क्या देश के शीर्ष मेधावी छात्रों को नीतिगत जटिलताओं और भविष्य के आर्थिक दृष्टिकोण के बजाय राजनीतिक जुमलों के घेरे में समेटना उनके बौद्धिक स्तर के साथ न्याय है?
असहमति व्यक्त करने वाले या आलोचकों के लिए नक्सल जैसे गंभीर सुरक्षा-संबंधी शब्दों का राजनीतिक मुहावरे के रूप में उपयोग करने से बौद्धिक विमर्श में स्वस्थ बहस की गुंजाइश कम होती है। यह पहला मौका नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी ने किसी गैर-राजनीतिक या अकादमिक मंच का इस्तेमाल अपने वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया हो।
उनके समर्थकों का मानना है कि उनकी यह शैली जटिल राजनीतिक संदेशों को सीधे और सरल तरीके से जनता तक पहुँचाने की अद्भुत क्षमता दर्शाती है। वे रूढ़िवादी और औपचारिक भाषणों से हटकर जन-संवाद की भाषा बोलते हैं, जिससे युवा उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं। हालांकि, आलोचकों और शिक्षाविदों का नज़रिया इससे अलग है। उनका तर्क है कि यह हर अवसर को चुनाव-केंद्रित विमर्श में बदल देने की एक सुविचारित तकनीक का हिस्सा है।
जब राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के औपचारिक आयोजनों में भी पार्टी-राजनीति की छाप दिखाई देने लगती है, तो इससे संस्थानों की निष्पक्षता और अकादमिक स्वायत्तता पर असर पड़ता है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को विचारों की विविधता, असहमति और स्वस्थ बहस का केंद्र माना जाता है। यदि देश का शीर्ष नेतृत्व ही शैक्षणिक मंचों से विभाजनकारी शब्दावली का प्रयोग करेगा, तो इससे संस्थानों में रचनात्मक संवाद की जगह वैचारिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिलेगा। शिक्षा का मूल उद्देश्य छात्रों में आलोचनात्मक सोच विकसित करना है।
इसके लिए आवश्यक है कि सत्ता में बैठे शीर्ष प्रतिनिधि अकादमिक परिसरों में राजनीति से ऊपर उठकर नीतिगत, आर्थिक और भविष्य-उन्मुख विमर्श प्रस्तुत करें। श्रीराम कॉलेज के मंच से उभरी यह बहस केवल एक भाषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि देश का भावी लोकतांत्रिक और बौद्धिक विमर्श किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इसी वजह से देश के भीतर अनपढ़ प्रधानमंत्री की चर्चा भी जोर पकड़ रही है जिसके पास सिवाय लगातार राजनीतिक प्रचार करने के अलावा दूसरा कोई ऐसा गुण नहीं है, जो युवाओं का मार्गदर्शन कर सके। युवाओ के साथ सीधे जुड़ने की बार बार कोशिश की असली वजह नवसृजित तेलचट्टा पार्टी है। जिसकी चपेट में पूरी सरकार आ गयी है। अब खुद मोदी भी यह समझ चुके हैं कि उनकी प्रचार यंत्र बनी मीडिया भी अपना असर खो चुकी है। ऐसे मे युवाओँ के साथ सीधा संवाद करने का उनका यह नया प्रयास है। अब इन प्रयासों का कितना लाभ अथवा नुकसान हो रहा है, इसका उत्तर फिलहाल समय के गर्भ में है।