नेपाल में बाढ़ के मलबों के नीचे दब गये हैं सैकड़ों लोग
शव मिलने की अब कोई उम्मीद नहीं
बेबस परिजनों ने संस्कार को पूरा किया
प्रतीक पुतला तैयार कर जलाया जाता है
काठमांडूः बाढ़ और भूस्खलन से तबाह हुए नेपाल के नुवाकोट और रसुवा जिलों में अपनों को खो चुके पीड़ित परिवारों की बची-खुची उम्मीदें भी अब खत्म हो चुकी हैं। हफ्तों तक अस्पतालों, मुर्दाघरों, उफनती नदियों के किनारों और पुलिस सूची में खोजबीन करने के बाद जब लापता लोगों के शव नहीं मिले, तो बेबस परिजनों ने हिंदू धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार पवित्र कुश घास से मानव रूपी पुतले बनाकर उनका सांकेतिक अंतिम संस्कार करना शुरू कर दिया है।
नुवाकोट में त्रिशूली नदी के तट पर शोक संतप्त परिवार एकत्र हो रहे हैं, जहां पुरोहित कुश घास से लापता व्यक्ति का प्रतीक पुतला तैयार करते हैं। इसके बाद इसे लकड़ी की चिता पर रखकर पूर्ण वैदिक विधि-विधान के साथ मुखाग्नि दी जाती है, ताकि मृतक की आत्मा को शांति मिल सके और परिवार शोक व्यक्त कर सके।
रसुवा में लापता हुए 37 वर्षीय कृष्ण श्रेष्ठ के 12 वर्षीय बेटे रोजेल श्रेष्ठ ने अपने पिता के प्रतीक रूप में इसी तरह अंतिम संस्कार किया। कृष्ण के भाई जीवन श्रेष्ठ ने कहा, हमने देश भर के अस्पतालों और मुर्दाघरों के चक्कर काटे, लेकिन शव नहीं मिला। आखिरकार परिवार ने आत्मा की मुक्ति के लिए परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार का फैसला लिया।
इसी तरह विदुर नगरपालिका के निरंजन पौडेल ने अपने माता-पिता, चाचा-चाची और चचेरे भाई सहित पांच लापता रिश्तेदारों के लिए यह धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किया। काठमांडू स्थित ऐतिहासिक पशुपति आर्यघाट पर भी ऐसे ही हृदयविदारक दृश्य देखे गए, जहां एक ही दिन में 100 से अधिक कुश के पुतलों का अंतिम संस्कार किया गया। नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देवमणि भट्टराई के अनुसार, हिंदू धर्मग्रंथों में यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि किसी प्राकृतिक आपदा में किसी के बह जाने या पूरा गांव नष्ट होने का स्पष्ट प्रमाण हो और शव मिलना असंभव हो जाए, तो प्रतीक्षा किए बिना कुश के पुतले से दाह संस्कार किया जा सकता है।