मुख्यमंत्री धामी के निर्देश पर उत्तराखंड में सर्वेक्षण प्रारंभ
चार की प्रारंभिक पहचान हो चुकी है
विशेषज्ञों की मदद से यह काम होगा
राज्य में तेरह ऐसी खतरनाक झीलें मौजूद
राष्ट्रीय खबर
देहरादूनः नेपाल में आई भीषण फ्लैश फ्लड के बाद उत्तराखंड सरकार ने राज्य की खतरनाक ग्लेशियल झीलों का सर्वेक्षण फिर से शुरू कर दिया है। सरकार का उद्देश्य प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (अर्ली वार्निंग सिस्टम) स्थापित करना है ताकि किसी भी आपदा से पहले जलग्रहण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सतर्क किया जा सके।
हालांकि, सरकार की धीमी गति यह दर्शाती है कि जमीन पर काम शुरू होने में अभी वर्षों का समय लग सकता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान और कई अन्य संगठनों की एक संयुक्त टीम ने राज्य की 13 खतरनाक ग्लेशियल झीलों की पहचान की है। किसी भी अनहोनी की स्थिति में इनके प्रभाव क्षेत्रों का आकलन करने के लिए सर्वेक्षण शुरू किया गया है। राज्य सरकार चार झीलों का सर्वेक्षण कर चुकी है, लेकिन विभिन्न कारणों से नौ झीलों का अध्ययन अभी बाकी है।
उत्तराखंड आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने दावा किया कि उन्होंने निगरानी प्रणाली को जल्द मजबूत करने का फैसला किया है। उन्होंने कहा, हमने चार खतरनाक झीलों का सर्वेक्षण पूरा कर लिया है और बाकी नौ झीलों का सर्वेक्षण करने की प्रक्रिया में हैं। हमने उन स्थानों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने और झीलों के टूटने पर सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनाई है।
उत्तराखंड के उच्च हिमाच्छादित क्षेत्रों में 1,200 से अधिक ग्लेशियल झीलें हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार, राज्य में 1,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाली 426 ग्लेशियल झीलें हैं, जिनमें से 13 को चार साल पहले खतरनाक घोषित किया गया था।
उत्तराखंड की ग्लेशियल झीलें नेपाल की उन झीलों से अधिक खतरनाक हैं, जिनकी वजह से 700 लोगों की जान गई थी। इनमें से कई झीलें अपने मूल स्थान से लगभग 1 किलोमीटर खिसक चुकी हैं। बढ़ता तापमान इस खतरे को और बढ़ा रहा है। इन ग्लेशियरों में एक छोटी सी दरार भी अकल्पनीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का कारण बन सकती है। केंद्र सरकार ने हाल ही में उत्तराखंड को अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने के लिए ₹30 करोड़ की मंजूरी दी है।