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प्रधानाध्यापक की पहल से नौ सौ बच्चों की जान बचा ली

तबाही से ठीक पहले सभी को ऊंचाई पर भेजा

सभी बच्चों से कहा पहाड़ की तरफ जाओ

स्कूल बसों को भी ऊंचाई वाले रास्ते पर भेजा

पूरा स्कूल अब मलबे में दबा हुआ नजर आ रहा

काठमांडूः नेपाल में आई भीषण बाढ़ से 900 विद्यार्थियों की जान बचाने वाले एक प्रधानाध्यापक ने आपबीती सुनाई है कि कैसे उन्होंने पानी के टकराने से महज 10 मिनट पहले ही पूरे स्कूल को खाली करा लिया था। नुवाकोट स्थित त्रिभुवन त्रिशूली माध्यमिक विद्यालय के प्रभारी राजेंद्र दवाड़ी ने बताया कि स्थानीय समयानुसार सुबह 09:10 बजे उन्हें आपदा की चेतावनी देने वाले चार फोन आए थे। इस प्राकृतिक आपदा में अब तक कम से कम 794 लोगों की जान जा चुकी है।

उन्होंने तुरंत बच्चों को ऊंची जगहों की ओर भागने का निर्देश दिया और छात्रों से भरी बसों को मोड़कर क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकलने का आदेश दिया। दवाड़ी ने कहा, अगर हमने तुरंत फैसला न लिया होता और 10 मिनट की भी देरी हो जाती, तो हम और हमारे छात्र आज आपसे बात करने के लिए जीवित न होते। उन्हें कुछ ही मिनटों के भीतर चार अलग-अलग लोगों से चेतावनियां मिलीं, जिससे आने वाले खतरे को भांपने में मदद मिली।

उन्होंने आगे बताया, एक अभिभावक आए और मुझसे कहा कि बहुत बड़ी बाढ़ आ रही है, मैं अपनी बेटी को लेने आया हूं। माता-पिता बिना किसी ठोस कारण के ऐसे नहीं आते, इसलिए यह तय हो गया था कि मुझे बच्चों को निकालने में एक सेकंड भी बर्बाद नहीं करना चाहिए। भले ही बाढ़ न आती, लेकिन यह केवल एक दिन की पढ़ाई का नुकसान होता। मुझे गर्व है कि हमने इतने लोगों की जान बचाई।

बुधवार को नेपाल के कई हिस्सों को तबाह करने वाली और कम से कम 2,426 लोगों को लापता करने वाली इस बाढ़ ने स्कूल की इमारत को मलबे और कीचड़ के नीचे दफन कर दिया। दवाड़ी ने बताया कि पानी इतनी तेजी से आया कि नदी से लगभग 100 मीटर की दूरी पर स्थित हॉस्टल की इमारत तुरंत जलमग्न हो गई। शुरुआत में कई छात्रों को स्थिति की गंभीरता का अंदाजा नहीं था। 16 वर्षीय छात्रा युनिशा अमात्य ने बताया कि वह और उसके दोस्त बाढ़ आने से ठीक 10 सेकंड पहले सुरक्षित स्थान पर पहुंचे थे।

युनिशा ने बताया कि जब अध्यापकों को जानकारी मिली, तो उन्होंने छात्रों को तुरंत घर जाने को कहा। वे स्कूल के पीछे के रास्ते से पहाड़ी की ओर भागे। देखते ही देखते उनकी आंखों के सामने पूरा स्थानीय बाजार बह गया। शिक्षक और छात्र पहले पहाड़ी पर कुछ सौ मीटर ऊपर गए और फिर एक पड़ोसी गांव में पहुंचे। सड़कें कट जाने से वे दो रातों तक वहां फंसे रहे, जिसके बाद उन्हें एयरलिफ्ट कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।

युनिशा के पिता युवराज अमात्य ने बताया कि वे अपनी बेटी को लेकर काफी चिंतित थे और बाजार को बहता देख डर गए थे, लेकिन जब आखिरकार फोन लगा और बेटी की आवाज सुनी तो वे अपने आंसू रोक नहीं पाए। प्रधानाध्यापक दवाड़ी का मानना है कि यदि बेहतर चेतावनी प्रणाली और साइरन होते तो लोग और जल्दी प्रतिक्रिया दे पाते, लेकिन उनके त्वरित फैसले ने एक बड़ी त्रासदी को टाल दिया।