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धीरे धीरे उजागर हो रहा है बंगाल के एसआईआर का असली खेल

38 लाख अपीलों में से 31 लाख नाम हटाने वाले थे

अधिकांश हटाये गये लोगों को जानकारी नहीं

न्यायाधिकरणों से गठन से खुल रहा है राज

सत्तर फीसद से अधिक मुसलमान लोग

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने 10 मार्च 2026 को पश्चिम बंगाल में अपीलीय न्यायाधिकरणों के गठन का निर्देश दिया था। यह फैसला मुर्शिदाबाद के भगवानगोला की 44 वर्षीय गृहिणी मोस्तारी बानू द्वारा भारत चुनाव आयोग की विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया के खिलाफ दायर पहली कानूनी चुनौती पर आया था। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि मतदाता सूची से नाम हटना अंतिम न हो और गलत तरीके से हटाए गए लोगों को न्याय का मंच मिले।

इस प्रक्रिया के तहत 27 लाख लोग अपील करने के हकदार थे। आयोग के अपने आंकड़ों के अनुसार, न्यायिक अधिकारियों द्वारा 27,16,393 मतदाताओं को अयोग्य पाकर सूची से हटा दिया गया था। न्यायाधिकरण के गठन के 168 दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट को दिए गए आंकड़ों में वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित लगभग 38 लाख अपीलों में से केवल 7 लाख अपीलें ही अपना नाम वापस जोड़ने के लिए दर्ज की गई थीं।  शेष अपीलें चुनाव आयोग और निजी आपत्तिकर्ताओं द्वारा अन्य लोगों के नाम शामिल किए जाने के खिलाफ (नाम हटाने के लिए) दायर की गई थीं। आयोग ने इस विभाजन को खारिज नहीं किया है। इसका अर्थ है कि हटाए गए 20,16,393 लोग (74.23 फीसद) कभी न्यायाधिकरण पहुंचे ही नहीं।

अपील करने वाले 7 लाख लोगों में से केवल 75,443 मतदाताओं के नाम बहाल किए गए हैं—जो कि अयोग्य ठहराए गए कुल लोगों का 2.78 फीसद और अपील करने वालों का 10.78 फीसद है। हटाए गए 20 लाख लोग पश्चिम बंगाल के कुल मतदाताओं का 2.95 फीसद हैं। प्रकाशित हटाई गई सूची (27,05,027 नाम) के उपनाम विश्लेषण के अनुसार, उनमें लगभग 19 लाख (70.2 फीसद) नाम मुस्लिम समुदायों के हैं, जबकि राज्य की मतदाता सूची में उनकी हिस्सेदारी 23.6 फीसद और कुल आबादी में 27 फीसद है।