राजनीति का रंगमंच अनिश्चितताओं और संभावनाओं का ऐसा ताना-बाना है, जहाँ जनमानस का मूड बदलते देर नहीं लगती। गुरुदत्त की कालजयी फिल्म का वह मशहूर नग्मा—वक्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम—आज भारतीय राजनीति के मौजूदा परिदृश्य पर बिल्कुल सटीक बैठता दिख रहा है। महज कुछ महीने पहले तक देश का राजनीतिक माहौल जिस दिशा में बह रहा था, आज उसमें एक साफ मोड़ और ठहराव नज़र आ रहा है। जो नेतृत्व कुछ ही समय पहले तक अजेय और चुनावी अभियानों में निर्विकल्प माना जाता था, आज उसे जनता, विशेषकर युवाओं के तीखे सवालों और संवाद के नए माध्यमों की राजनीतिक सजगता का सामना करना पड़ रहा है।
लोकतंत्र में संचार और अभिव्यक्ति के माध्यम समय के साथ निरंतर बदलते रहे हैं। आज का युवा वर्ग अपनी असहमति या राजनीतिक दृष्टिकोण को व्यक्त करने के लिए इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल मीम्स का व्यापक सहारा ले रहा है। कभी चुनावी रणनीतियों का अहम हिस्सा रहे पुराने बयान और वादे अब डिजिटल दौर की याददाश्त में दर्ज होकर पुनः सतह पर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर जिस प्रकार से तीखे व्यंग्य और मीम्स के जरिए शासन-प्रशासन के बयानों को घेरा जा रहा है, उसने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक दौर में राजनीतिक आख्यान (नरेटिव) पर एकतरफा नियंत्रण बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है। जनता अब केवल भाषणों को सुनती ही नहीं, बल्कि उनके धरातलीय असर की समीक्षा भी तुरंत करती है।
हाल के दिनों में जब दिल्ली की सड़कों पर नीतिगत मामलों और जन-आंदोलनों के दौरान पैलेट गन या कड़े प्रशासनिक कदमों के इस्तेमाल पर सवाल उठे, तो यह अपेक्षा की जा रही थी कि शीर्ष नेतृत्व सदन के भीतर इन विषयों पर स्पष्ट और पारदर्शी दृष्टिकोण रखेगा। संसदीय बहस से दूरी या कड़े सवालों पर चुप्पी को अक्सर राजनीतिक रक्षात्मकता के रूप में देखा जाने लगता है, जिससे यह संदेश जाता है कि सरकार जनभावनाओं और लोकतांत्रिक सवालों का सीधे तौर पर सामना करने में हिचकिचा रही है।
कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी स्थितियां बहुत आसान नहीं दिखती हैं। किसी भी देश के लिए कूटनीति दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर आधारित होती है, न कि व्यक्तिगत संबंधों के प्रदर्शन पर। पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय नेताओं के साथ व्यक्तिगत तालमेल और मित्रता का जो आख्यान गढ़ा गया, वह समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय बयानबाजियों और वैश्विक दबावों के चलते कसौटी पर कसा गया है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर बनी छवि का घरेलू राजनीति में लगातार लाभ पाना कठिन साबित हो रहा है।
इसी बात पर चर्चित पुरानी फिल्म कागज के फूल का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था कैफी आजमी ने और संगीत में ढाला था सचिन देव वर्मन ने। इसे गीता दत्त ने अपना स्वर प्रदान किया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं
वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम
तुम रहे न तुम हम रहे न हम
वक़्त ने किया…
बेक़रार दिल इस तरह मिले
जिस तरह कभी हम जुदा न थे
तुम भी खो गए, हम भी खो गए
एक राह पर चलके दो क़दम
वक़्त ने किया…
जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम
वक़्त ने किया…
आंतरिक स्तर पर भी संगठन और मंत्रिमंडल के भीतर शक्ति-संतुलन की सुगबुगाहट साफ सुनाई देने लगी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में बदलावों की चर्चाओं के बीच वरिष्ठ नेताओं का अपना स्वतंत्र रुख अपनाना और नए नेतृत्व के लिए स्थान बनाने की बातें उठना यह दर्शाता है कि संगठन के भीतर संवाद की संरचना बदल रही है। जब शीर्ष स्तर के वरिष्ठ नेता उम्र और नई पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपने की दलीलें खुलकर सार्वजनिक मंचों पर रखते हैं, तो इसे केवल व्यक्तिगत विचार नहीं माना जा सकता। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी और सत्ता संरचना के भीतर अब बदलाव की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है और एकछत्र नेतृत्व की शैली को आंतरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
राजनीति का चक्र निरंतर घूमता रहता है। जनसमर्थन और सत्ता का प्रभाव कभी भी स्थाई नहीं होता। जो लहर कल तक किसी एक दिशा में प्रचंड रूप से बह रही थी, आज उसमें बिखराव और बदलाव के संकेत स्पष्ट हैं। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि यह किसी भी शक्ति-केंद्र को अजेय रहने की मुगालता नहीं पालने देता। समय की यह आहट सत्ता के शीर्ष नेतृत्व के लिए आत्ममंथन का संदेश है कि भाषणों और बयानों से इतर धरातल की सच्चाई, पारदर्शी संवाद और संगठन की आंतरिक लय ही अंतिम रूप से जनविश्वास को बनाए रख सकती है।