तेलचट्टों ने देश की सोच ही बदल डाली है
राजनीतिक परिदृश्य में जब कभी भी सत्ताधारी दल के कदमों को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, तब-तब नेतृत्व द्वारा अपनाए जाने वाले जनसंपर्क तौर-तरीकों पर चर्चा तेज हो जाती है। यह समय शायद इस बात का है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी उस पुरानी शैली को फिर से अपनाएं, जिसे चतुर राजनीतिक विज्ञापन और चापलूसी भरे व्यक्तिगत पत्राचार के अनूठे मिश्रण के रूप में देखा जाता रहा है।
कुछ साल पहले मेरी मां के नाम आया एक पत्र जनसंचार के किसी भी उस माहिर के लिए ईर्ष्या का विषय बन सकता था, जो मतदाताओं से बिना किसी जटिल संवाद के सीधे जुड़ना चाहता हो। यह दीगर बात है कि संसद के भीतर तीखे सवालों से बचना केवल हमारे प्रधानमंत्री तक ही सीमित नहीं रहा है। ब्रिटिश राजनीति के इतिहास में भी ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहां प्रधानमंत्री को कठिन संसदीय बहसों का सामना करने में भारी असहजता का अनुभव हुआ।
इसके विपरीत, कुछ राजनेताओं ने अपने तीखे और हास्यपूर्ण जवाबों से सदन में तालियां बटोरीं, लेकिन भारत में जब हमने ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की नकल की, तो हमने प्रधानमंत्री से सीधे सवाल पूछने वाले उस बहुचर्चित साप्ताहिक सत्र यानी प्रधानमंत्री प्रश्नकाल को अपनी व्यवस्था से बाहर ही छोड़ दिया। इस चयनात्मक नकल के पीछे अक्सर यह दलील दी जाती रही है कि हमारी विधायी व्यवस्था प्राचीन परंपराओं पर आधारित है।
बिहार की प्राचीन वैशाली को दुनिया के सबसे शुरुआती गणराज्यों में गिना जाता है, जहां ईसा पूर्व छठी शताब्दी के आसपास लिच्छवी वंश ने गण-संघ नामक एक सहयोगात्मक शासन प्रणाली का अभ्यास किया था। हालांकि, आधुनिक भारत ने इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को एक नया रूप दिया है, जिसके तहत जनता से सीधा संवाद स्थापित करने के लिए विज्ञापन विशेषज्ञों की सेवाएं ली जाती हैं।
आप सभी को याद है कि प्रधानमंत्री द्वारा 27 मार्च 2015 के एक आह्वान का जिक्र था, जिसमें नागरिकों से रसोई गैस यानी एलपीजी पर मिलने वाली सब्सिडी को स्वेच्छा से छोड़ने की अपील की गई थी। यह दावा किया गया कि अनेक लोगों ने इस अनुरोध का पालन किया था, और इस कदम को किसी प्रकार की जन-नेतृत्व वाली क्रांति की शुरुआत बताया गया था।
इसके साथ ही, उन्हें एलईडी बल्बों के उपयोग को बढ़ावा देने जैसी अन्य त्याग वाली पहलों में भी शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। सच्चाई यह है कि जिस देश में आर्थिक विषमताएं तेजी से बढ़ रही हों, जहां कुछ गिने-चुने लोगों की आय में भारी उछाल आता हो और दूसरी ओर सरकारी नौकरियों के लिए लाखों की संख्या में युवा दर-दर भटकने को मजबूर हों, वहां स्वेच्छा से वित्तीय कटौती की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं लगता।
शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए केंद्रीय बजट आवंटन में पिछले एक दशक में आई गिरावट यह बयां करती है कि जमीनी ज़रूरतें क्या हैं। इसके अलावा, जब बायोमेट्रिक अपडेट और आधार कार्ड से जुड़ी अनिवार्यताएं नागरिकों पर थोपी जाती हैं, तो सब्सिडी और रियायतों का दायरा लगातार सिमटता चला जाता है।
हाल ही में भारतीय सांख्यिकी संस्थान जैसे प्रतिष्ठित और स्वायत्त शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े विधायी घटनाक्रमों ने भी सूचना के अधिकार और अकादमिक स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। ऐतिहासिक रूप से यह माना जाता है कि सूचना ही सबसे बड़ी शक्ति है। इतिहास के पन्नों में फ्रांसीसी क्रांति के समय के वे प्रसंग भी दर्ज हैं जहां शासक वर्ग जमीनी हकीकत से पूरी तरह अनजान था। इसी प्रकार, चीन के अंतिम सम्राट पुइ का जीवन भी इस बात का गवाही देता है कि किस प्रकार सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अपने ही महलों की चारदीवारी के भीतर आम जनजीवन की वास्तविक कठिनाइयों से कट जाते हैं।
आज के समय में जब देशव्यापी स्तर पर राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों द्वारा नए सिरे से जन-संवाद कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की जा रही है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि शासन और जनता के बीच की इस खाई को पाटा जाए। सत्ता और समाज के बीच का यह संवाद केवल दिखावटी पत्रों तक सीमित न रहकर ज़मीनी वास्तविकताओं को समझने वाला होना चाहिए, तभी एक सच्चे और जीवंत लोकतंत्र की सार्थकता सिद्ध हो सकती है।
सत्ता पक्ष को अब इस बात की परेशानी है कि बार बार गोल पोस्ट बदलने का खेल अब जनता अच्छी तरह समझ चुकी है। पहले लोग ट्रोल किये जाने की वजह से गलत बातों का विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाते थे। अब कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन और दिल्ली के जंतर मंतर पर पुलिस की कार्रवाई को देखकर पूरे देश की जनता इस कदर नाराज हुई है कि इस किस्म का भाजपा का प्रचार करने वाले लोगों को लगातार सोशल मीडिया में विरोध का सामना करना पड़ रहा है। पुराने दांव अब फेल हो रहे हैं।