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हाईड्रोजन टरबाइन से बिजली का उत्पादन किया

केआईटी के वैज्ञानिको ने नई तकनी से महत्वपूर्ण सफलता पायी

हरित ऊर्जा उत्पादन में बड़ी उपलब्धि

चलाने के लिए बाहरी ऊर्जा नहीं लगती

कंप्रेसर खुद ही इसे चालू कर लेता है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः जर्मनी के प्रतिष्ठित कार्लस्रुहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (केआईटी) के वैज्ञानिकों ने हाइड्रोजन ऊर्जा तकनीक के विकास में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मील का पत्थर पार कर लिया है। शोधकर्ताओं ने हाल ही में एक नई कंप्रेसर-रहित गैस टरबाइन का सफलतापूर्वक संचालन किया, जो बिना रुके रिकॉर्ड 303 सेकंड यानी पांच मिनट से अधिक समय तक लगातार चालू रही। इस उन्नत बर्नर ने प्रेशर-गेन कंबशन  की अत्यधिक उन्नत प्रणाली का उपयोग किया है, जिसने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के पिछले 250 सेकंड के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।

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यह सफलता स्वच्छ और हरित ऊर्जा के उत्पादन की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। पारंपरिक जीवाश्म ईंधन या प्राकृतिक गैस के विपरीत, हाइड्रोजन का उत्पादन पूरी तरह से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के माध्यम से किया जा सकता है। इसी वर्ष की शुरुआत में, KIT की इसी शोध टीम ने दुनिया में पहली बार एक ऐसी हाइड्रोजन गैस टरबाइन से बिजली उत्पन्न करने का कारनामा किया था, जिसे संचालित करने के लिए किसी भी प्रकार के पारंपरिक यांत्रिक कंप्रेसर की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

पूर्व के प्रयोगों में यह तकनीक केवल एक सेकंड के छोटे से हिस्से तक ही चल पाती थी, क्योंकि लंबे समय तक संचालन से अत्यधिक गर्मी के कारण दहन कक्ष पिघल जाते थे। नए परीक्षण ने इस संचालन समय को बढ़ाकर पांच मिनट से अधिक कर दिखाया है। थर्मल एनर्जी टेक्नोलॉजी एंड सेफ्टी इंस्टीट्यूट (आईटीईएस) के निदेशक प्रोफेसर डेनियल बानुती ने इस उपलब्धि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह एक जीवाश्म-मुक्त ऊर्जा प्रणाली के लिए अत्यधिक कुशल और लचीली हाइड्रोजन ऊर्जा की ओर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।

इस अनोखे डिजाइन का सबसे बड़ा और मुख्य लाभ यह है कि इसके संचालन के लिए दहन प्रक्रिया शुरू होने से पहले हवा को संपीड़ित करने के वास्ते किसी बाहरी ऊर्जा की जरूरत नहीं पड़ती है। पारंपरिक गैस टरबाइन, जैसे कि बिजली घर या विमानों के पंखों के नीचे उपयोग की जाती हैं, वे अपनी कुल बिजली क्षमता का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा केवल हवा को उच्च दबाव पर संपीड़ित करने में ही खर्च कर देती हैं। इसके विपरीत, नई टरबाइन में डेटोनेसन वेव्स यानी प्रस्फोटन तरंगों का उपयोग किया जाता है। केआईटी प्रणाली हवा के दबाव को बाहर से बढ़ाने के बजाय सीधे दहन कक्ष के अंदर ही आवश्यक दबाव का निर्माण करती है।

यह प्रक्रिया बहती हुई गैसों में तरंग और भंवर पैटर्न से जुड़ी एक द्रव यांत्रिक अस्थिरता के माध्यम से काम करती है। कंप्रेसर को पूरी तरह से हटा देने से ऊर्जा के नुकसान में भारी कमी आती है, चलते-फिरते पुर्जे कम होते हैं और कुल मिलाकर टरबाइन की दक्षता में अभूतपूर्व सुधार होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, हाइड्रोजन तकनीक इसलिए सबसे बेहतर रूप से काम करती है क्योंकि यह बहुत तेजी से प्रतिक्रिया करती है और दबाव में स्थिर वृद्धि उत्पन्न करने में सक्षम है। भविष्य में इस तकनीक से हल्की, सस्ती और अत्यधिक कुशल टरबाइनें बनाई जा सकेंगी, जिनका उपयोग न केवल बिजली उत्पादन में बल्कि लंबी अवधि में विमानन  के क्षेत्र में भी किया जा सकेगा। दहन की तीव्र ऊर्जा को टरबाइन तक स्थानांतरित करना एक बड़ी तकनीकी चुनौती थी, जिसे केआईटी के इंजीनियरों ने सफलतापूर्वक हल कर लिया है।

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