शिवसेना और टीएमसी की गतिविधियों पर नकेल की याचिका
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल द्वारा दायर एक रिट याचिका पर केंद्र सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इस याचिका में संविधान की दसवीं अनुसूची की उस व्याख्या पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जिसके तहत राजनीतिक दल के विलय का सहारा लेकर जनप्रतिनिधि (विधायक या सांसद) दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बच निकलते हैं। न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने खुद याचिकाकर्ता के रूप में अदालत में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की दलीलें सुनने के बाद केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है।
सुनवाई की शुरुआत में, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने सिब्बल द्वारा सीधे अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करने पर सवाल उठाया और यह भी कहा कि जिन मामलों को संसद या राज्य विधानसभाओं (सदन के पटल) या राजनीतिक दलों पर छोड़ दिया जाना चाहिए, उनमें न्यायिक हस्तक्षेप करने को लेकर अदालत झिझक महसूस करती है।
इस पर दलील देते हुए कपिल सिब्बल ने अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से तर्क दिया कि दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत विलय के प्रावधानों की वर्तमान व्याख्या का देश की लोकतांत्रिक और राजनीतिक व्यवस्था पर बेहद गंभीर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस चोर दरवाजे के जरिए जनता द्वारा दिए गए जनादेश और चुनावी बहुमत को पूरी तरह से उलट दिया जाता है, जिससे अल्पमत वाले दल अचानक बहुमत में आ जाते हैं। गोवा से जुड़े और वर्तमान में अदालत में लंबित एक मामले का हवाला देते हुए सिब्बल ने कहा, इस अनुचित प्रक्रिया और वर्तमान कानूनी खामियों के माध्यम से जनता के प्रत्यक्ष चुनावी जनादेश को मनमाने ढंग से बदल दिया जाता है।
इस पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने भी माना कि दसवीं अनुसूची का मूल उद्देश्य जनप्रतिनिधियों और विधायकों के आचरण को नियंत्रित व अनुशासित करना था। पीठ ने यह स्वीकार किया कि व्यावहारिक रूप से इसके क्रियान्वयन में अत्यधिक गंभीर मुद्दे और खामियाँ सामने आई हैं। सिब्बल ने पीठ की इस टिप्पणी का उत्तर देते हुए कहा कि सत्ता में बैठे लोग कभी भी ऐसे महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों पर निष्पक्षता से फैसला नहीं होने देंगे, इसलिए शीर्ष अदालत का हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक है।
उनकी याचिका में मुख्य रूप से यह मुद्दा उठाया गया है कि दल-बदल विरोधी कानून की मौजूदा व्याख्या का दुरुपयोग करके किसी दल से अलग हुआ गुट दूसरे दल में विलय का बहाना बनाकर अयोग्यता से बच जाता है। यह याचिका ऐसे समय में आई है जब हाल के दिनों में आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना जैसे कई प्रमुख दलों के विधायकों और सांसदों का भारतीय जनता पार्टी या अन्य सत्तारूढ़ दलों में विलय के कई उदाहरण सामने आए हैं।