धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मजबूरी का अंतिम रास्ता ही था
भुवनेश्वर: शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उनके उस राजनीतिक करियर में एक अप्रत्याशित मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, जो लगातार सफलता की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा था। ओडिशा में भारतीय जनता पार्टी की पहली ऐतिहासिक जीत के मुख्य सूत्रधार और देश के अन्य हिस्सों में पार्टी की सिलसिलेवार चुनावी सफलताओं में अहम भूमिका निभाने वाले धर्मेंद्र प्रधान खुद कभी छात्र राजनीति के दौर में प्रश्नपत्र लीक मामले के खिलाफ बड़े आंदोलन का चेहरा रहे थे।
धर्मेंद्र प्रधान पहली बार 1996 में राष्ट्रीय सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बैनर तले ओडिशा में कक्षा 12वीं के प्रश्नपत्र लीक के कथित मामले के खिलाफ एक बड़े छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया था। इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज में वे गंभीर रूप से घायल भी हो गए थे।
इस आंदोलन के चार साल बाद, सन 2000 में उन्होंने पल्लहड़ा विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीता और ओडिशा विधानसभा पहुंचे। वर्ष 2001 में उन्हें ओडिशा में भाजपा की युवा शाखा भारतीय जनता युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। संगठन कौशल को देखते हुए 2002 में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय सचिव नियुक्त किया गया और 2004 में वे युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर पदोन्नत किए गए।
वर्ष 2004 ही वह समय था जब उन्होंने देवगढ़ संसदीय क्षेत्र से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में कदम रखा। उस दौरान ओडिशा में भाजपा और बीजू जनता दल का गठबंधन था। हालांकि, 2009 के चुनावों में उनके राजनीतिक सफर को झटका लगा। परिसीमन के बाद देवगढ़ लोकसभा सीट समाप्त हो गई और भाजपा-बीजद गठबंधन भी टूट गया, जिसके चलते वे पल्लहड़ा सीट से विधानसभा चुनाव हार गए। इसके बावजूद, धर्मेंद्र प्रधान ने अपनी संगठनात्मक क्षमताओं के बल पर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह मजबूत की। वे बाद में राज्यसभा के रास्ते संसद पहुंचे और केंद्र सरकार में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस तथा शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला। अब कॉकरोचों के आंदोलनों की आंच में उनकी कुर्सी चली गयी।